बुधवार, 29 जनवरी 2020

आसमां भर दुनिया...

जितना आसमां हम देख सकते है
हमारी दुनिया उससे ज्यादा नही हो सकती
 जितने तारे आसमां मे है शायद वो सब जिद्दी होंगे इसीलिये सितारे बन गये और जमीं के अधूरेपन को महसूस करते होंगे.
जो जिद्दी नही होते वो कुछ खास कर नही पाते है आजीवन. जिद इंसान को आसमां बडा देखना सिखाती है.

ये दुनिया जितनी छोटी समझते हो असल मे उतनी है नही और जितना बडा तुम कालचक्र को समझते हो वो असल मे उससे भी बडा है.

आसमां के सितारे (जितने हम देख सकते है) और जमीं के पागल ( जिद्दी )इंसान एक दूसरे की तुलना मे काफ़ी लगते है पर जमीं पर कम ही मिलेंगे नगण्य भी कह सकते हो क्यूकी पागल कोई बनना ही नही चाहता.
पागल बनने का एक फ़ायदा है, वह दूसरो को है कि वो किसी से शिकायत नही करता बल्कि बड़ी से बड़ी समस्याओं का तोड़ उसके पास होता है जिनसे धरा के नियम भी बदलने जैसे आव्रति होती है.

पिछली रात एसे ही मन मे ख्याल आया  कि  अगर खुद सितारा होता तो क्या होता या कहा होता या क्यू होता...  मै बालकनी से सप्तऋषि मंडल कहे जाने वाले तारो के झुंड को देख रहा था ( जो कि एक प्रश्नवाचक चिह्न की आकृति के भाँति दिखता है. बचपन मे मां ने बताया था कि आसमां की सबसे खूबसूरत जगह यह है) तो मैने खुद को वहा होना पाया. क्यूकि मुझे भी आसमां का यह हिस्सा बचपन से पसंद है.

#दिल_जयपुरी

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