शनिवार, 22 मई 2021

श्मशान है, उधर...


 







श्मशान है, उधर से ना गुजरो


तुम्हारी निगाहें इंतजार देख ना पायेंगी

ना ही देख पायेगी कतार से जलते शव...

तुम्हारे गुजरने से लम्बा लगेगा इंतजार

लाशों को अपने दाग का...


और.... 

और कही तुम ठहर गये

तो तुम्हारे पैर टिक नही पायेंगे जमीं पर

यह देखकर कि साथ मे विरासत से कुछ नहीं है

कतार मे काठियां ही काठियां है...


ना ही तुम्हारा मन इतना कठोर होगा

देख पाये कि सिस्टम ने भरोठे मे लाशें भेजी है


ऐसा ना हो कही भीग जाओ अपने ही पसीने में 

सिहर जाओ सोचकर कि क्या चुन लिया 

कही गलतियां याद आ जाये 

और खुद को माफ ना कर पाओ


श्मशान है, उधर से ना गुजरो


काठियां - सजी धजी लाशे

भरोठे - गठरियाँ 

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