जो अजीब से लिबास मे है
वह शख्स,
जिसने बचाये है
अनगिनत बिखरने को उतारू सपने
वह शख्स,
घर तो जाता है मगर
नही चूम सकता अपनी बेटी का माथा
कुछ देर, बीबी से दूर रहकर बात करता है
और फिर लौट जाता है अपना कर्त्तव्य निभाने
वह शख्स,
एक अरसे से, अपनी मां से नही मिला
उसे नही पता होता
किस का क्या नाम है, किस के सर टोपी है या
किस के माथे पर तिलक है
और उसे नही पता होता कि
एक जिंदगी से चलने वाली
कितनी जिंदगीयां बचाता है रोज
वह शख्स
जो अजीब से लिबास मे है.
जिसने बचाये है
अनगिनत बिखरने को उतारू सपने

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