#दिल_का
ये बिज़ली के तार कहा तक जाते होंगे. य़ह बिज़ली आती कहा से है. पत्थर कभी खत्म नहीं होगा क्या इस धरती से क्युकी ये तो बनता नहीं है मशीन से. बचपन मे एसे ही अनगिनत सवालों के साथ एक मुस्कान उसे देखकर भी आती थी कि आगन के उधर वाले कोने से और काकी के घर के ठीक उपर से रोज देर शाम को एक चीलगाड़ी गुजरती है जो अपने पीछे एक लम्बा सा धुआं का रास्ता छोड़ती जाती है जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि बहुत दूर से आयी होगी सच मे य़ह. बिन वजह के हमेशा मुस्कान बिखेरे होंठ. पेप्सी के ढक्कन की फिरकी भी बनाने का अलग ही लेवल का अनुभव रहा है. खिलौने भी तो सिर्फ वो ही होते थे ना जिन्हें हमने या मम्मा ने हाथ से बनाया हो मिट्टी या लकड़ी के खिलौने. मैं गत्ते की गाड़ी बहुत अच्छी बनाता था और फिर उसे देखकर मेरा छोटा भाई जलता था फिर वो ट्रिक उसने मेरी गाड़ी देखकर ही सीख ली और उसने भी ठीक वैसी की वैसी चार पहियों वालीं गत्ते की गाड़ी बना दी. मैंने भी सबकी तरह बाबा और बाऊ से बहुत किस्से कहानिया सुनी है जो अब तक मुझे याद है.
मै हमेशा से आजाद ख़यालात वाला रहा हू. मैंने अपने विचारो को बांधकर नहीं रखा कभी ना बचपन मे ना अब. बचपन मे एसे ही विचारो की वज़ह से खूब बापू के हाथो ने इज़्ज़त बरसाई है पीठ पर. अब जब ना कोई लड़ने वाला है ना कोई रोकने वाला है ना कुछ एसा की किसी से मांगना पड़े पर सब अधूरा रह जाने का सा लगता है. सब कुछ पीछे छूट जाने सा लगता है. अब जिंदगी एक समस्या से सुलझते उलझते गुजरे जा रहीं है.
सरकारी नौकरी लग जाती है पर उसके एक समय बाद लगता है कि सच मे गुब्बारे मे रखा रसगुल्ला चूस रहे है हम. एक नजरिये से देखा जाए तो अच्छा जीवन उसी का रह गया है जिसके पास सरकारी रोजगार है दूसरे की नजर मे परंतु जहा तक मैं सोचता हू तो सरकारी नौकर का मानना होता है कि वो ये बनने के बाद वह किसी भी प्रकार की समस्या नहीं चाहता जीवन मे किसी भी प्रकार का संघर्ष वो नहीं कर पाएगा इसीलिए उसे नौकरी की जरूरत है. वह सिर्फ उतना ही करना चाहता है जितना उससे कहा जाता है. सबका अपना नजरिया है खैर. मेरा नजरिया नकारात्मक और सवालात वाला है थोड़ा पर उसका मुझे कोई अफसोस नहीं है बल्कि मैं भी सरकारी नौकर हू.
सांसे रुक जाती है वक्त नहीं रुकता. उम्र निकल जाती है डील डल हो जाता है. पैदा होने से रोजगार पाने से ठीक पहले तक का वक़्त सबका अपना वक्त होता है जो उसने अपने लिए दिया होता है. जिसमें अपनी तरह का थोड़ा जिया होता है. उसके बाद आजीवन खुद के लिए वक़्त नहीं होता इंसान के पास. मुझे पता नहीं है आज कहना क्या चाहता हू पर मन मे एसे ही कुछ चल रहा है जिससे खुद अनभिज्ञ हू फ़िलहाल मैं.
#दिल_जयपुरी
ये बिज़ली के तार कहा तक जाते होंगे. य़ह बिज़ली आती कहा से है. पत्थर कभी खत्म नहीं होगा क्या इस धरती से क्युकी ये तो बनता नहीं है मशीन से. बचपन मे एसे ही अनगिनत सवालों के साथ एक मुस्कान उसे देखकर भी आती थी कि आगन के उधर वाले कोने से और काकी के घर के ठीक उपर से रोज देर शाम को एक चीलगाड़ी गुजरती है जो अपने पीछे एक लम्बा सा धुआं का रास्ता छोड़ती जाती है जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि बहुत दूर से आयी होगी सच मे य़ह. बिन वजह के हमेशा मुस्कान बिखेरे होंठ. पेप्सी के ढक्कन की फिरकी भी बनाने का अलग ही लेवल का अनुभव रहा है. खिलौने भी तो सिर्फ वो ही होते थे ना जिन्हें हमने या मम्मा ने हाथ से बनाया हो मिट्टी या लकड़ी के खिलौने. मैं गत्ते की गाड़ी बहुत अच्छी बनाता था और फिर उसे देखकर मेरा छोटा भाई जलता था फिर वो ट्रिक उसने मेरी गाड़ी देखकर ही सीख ली और उसने भी ठीक वैसी की वैसी चार पहियों वालीं गत्ते की गाड़ी बना दी. मैंने भी सबकी तरह बाबा और बाऊ से बहुत किस्से कहानिया सुनी है जो अब तक मुझे याद है.
मै हमेशा से आजाद ख़यालात वाला रहा हू. मैंने अपने विचारो को बांधकर नहीं रखा कभी ना बचपन मे ना अब. बचपन मे एसे ही विचारो की वज़ह से खूब बापू के हाथो ने इज़्ज़त बरसाई है पीठ पर. अब जब ना कोई लड़ने वाला है ना कोई रोकने वाला है ना कुछ एसा की किसी से मांगना पड़े पर सब अधूरा रह जाने का सा लगता है. सब कुछ पीछे छूट जाने सा लगता है. अब जिंदगी एक समस्या से सुलझते उलझते गुजरे जा रहीं है.
सरकारी नौकरी लग जाती है पर उसके एक समय बाद लगता है कि सच मे गुब्बारे मे रखा रसगुल्ला चूस रहे है हम. एक नजरिये से देखा जाए तो अच्छा जीवन उसी का रह गया है जिसके पास सरकारी रोजगार है दूसरे की नजर मे परंतु जहा तक मैं सोचता हू तो सरकारी नौकर का मानना होता है कि वो ये बनने के बाद वह किसी भी प्रकार की समस्या नहीं चाहता जीवन मे किसी भी प्रकार का संघर्ष वो नहीं कर पाएगा इसीलिए उसे नौकरी की जरूरत है. वह सिर्फ उतना ही करना चाहता है जितना उससे कहा जाता है. सबका अपना नजरिया है खैर. मेरा नजरिया नकारात्मक और सवालात वाला है थोड़ा पर उसका मुझे कोई अफसोस नहीं है बल्कि मैं भी सरकारी नौकर हू.
सांसे रुक जाती है वक्त नहीं रुकता. उम्र निकल जाती है डील डल हो जाता है. पैदा होने से रोजगार पाने से ठीक पहले तक का वक़्त सबका अपना वक्त होता है जो उसने अपने लिए दिया होता है. जिसमें अपनी तरह का थोड़ा जिया होता है. उसके बाद आजीवन खुद के लिए वक़्त नहीं होता इंसान के पास. मुझे पता नहीं है आज कहना क्या चाहता हू पर मन मे एसे ही कुछ चल रहा है जिससे खुद अनभिज्ञ हू फ़िलहाल मैं.
#दिल_जयपुरी
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