रविवार, 30 अगस्त 2026

एक परदेशी की डायरी: शहर


​कुछ शहर

अक्षर देते हैं भाषा को,

कुछ खोलते हैं

संसार के कई आवरण।

​कुछ शहर

केवल प्रतिध्वनि बनकर

दोहराते हैं हमारा नाम।

​परंतु इन सबसे इतर...

कुछ शहर

हृदय में उतरकर जीना सिखाते हैं।

​जहाँ हम

मार्ग नहीं ढूँढते,

शहर स्वयं

हमारी परछाइयों को पढ़ता है।

​जहाँ वीथिकाएँ

केवल गंतव्य तक नहीं ले जातीं,

कभी-कभी

स्वयं से साक्षात कराती हैं।

​और सौंप देते हैं वे शहर,

समय की परिधि से परे—

अक्षुण्ण आत्मीयताओं के कुछ अनूठे संबंध।

​और जब अंततः

हम बदलते हैं सरहद,

शहर पीछे छूट जाता है अतीत बनकर—

किंतु उसके दिए हुए रिश्ते,

जीवन भर हमारे भीतर स्पंदित होते रहते हैं

बुधवार, 5 अगस्त 2026

परेशान तेरे शहर के लोग

मेरे कारवाँ की बात और परेशान तेरे शहर के लोग,

ज़रा ऊँची उड़ान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने ख़्वाब आँखों में रखे, उन्हें गुनाह नज़र आए,

बस एक नए जहान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


उन्हें आदत है झुकी हुई गर्दनों को देखने की,

ज़रा सिर उठाकर चलने की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने सच को सच ही कहा, न कम कहा न ज़्यादा कहा,

बस साफ़ ज़ुबान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


जो ख़ुद किनारों से आगे कभी निकल न सके,

ज़रा दरिया पार की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


यहाँ हर शख़्स चाहता है कि तुम उसके हिसाब से जीओ,

ज़रा अपनी पहचान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


सच की धूप पड़ी तो कई चेहरे पिघलने लगे,

बस खुले बयान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


उनके हाथ में पत्थर थे, मेरे हाथ में हौसला था,

ज़रा इम्तिहान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने वक़्त से कहा—ठहर, अभी बहुत सफ़र बाकी है,

बस नए मुकाम की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने बस ख़्वाब क्या देखा, इल्ज़ामों का दौर चल पड़ा,

ज़रा नए आसमान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


यहाँ बौनों को डर है कहीं क़द का हिसाब न हो जाए,

ज़रा ऊँचे मकान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने दरिया पार करने की ठान ली तो शोर मच गया,

ज़रा कश्ती, तूफ़ान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


'दिल जयपुरी' अभी सफ़र में है, फ़ैसला अभी न कीजिए,

कल मेरे कारवाँ की बात... और परेशान तेरे शहर के लोग।

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

मौन रत्तीभर सुकून... 2

 मौन की तलाश


हरजाई जहाँ, समाँ पराया-सा,

फिर भी मैं मौन की तलाश में हूँ।

इस बिलबिलाती दुनिया में,

मैं रत्तीभर सुकून की तलाश में हूँ।


शोर इतना है कि अपनी ही आवाज़ सुनाई नहीं देती,

मैं अपने भीतर की ख़ामोशी की तलाश में हूँ।


चेहरों के इस मेले में सब अपने लगते तो हैं,

मगर मैं एक सच्चे इंसान की तलाश में हूँ।


यहाँ हर रिश्ता किसी मतलब की डोर से बँधा है,

मैं बेवजह निभ जाने वाले साथ की तलाश में हूँ।


भीड़ तो हर मोड़ पर मिल जाती है,

मैं ख़ुद से मिलने वाले एकांत की तलाश में हूँ।


शायद यह तलाश कभी मुकम्मल न हो,

फिर भी मैं उसी अधूरी राह का मुसाफ़िर हूँ।

इस बिलबिलाती दुनिया में,

मैं रत्तीभर सुकून की तलाश में हूँ।

जिंदगी जुआ है... 2

 ज़िंदगी में...


ज़िंदगी में हर साँस जुआ है...

जो पिछली साँस के बाद आती है।


हर सुबह जुआ है...

जो हर रात के बाद जन्म लेती है।


हर दूसरी धड़कन जुआ है...

जो पहली धड़कन के भरोसे चलती है।


हर क़दम जुआ है...

जिसका अंजाम किसी ने नहीं देखा।


मगर...


सबसे बड़ा जुआ उम्मीद है..... 


क्योंकि इंसान साँसों से नहीं,

उम्मीदों से जीता है......। 

तेरी मुस्कान का क़ैदी

 बहुत याद आता है...


बहुत याद आता है तेरा वो कातिलाना मुस्कुराना,

और मेरा तेरी मुस्कान पर हर बार दिल हार जाना।


तेरी आँखों की ख़ामोशी में जाने कितनी बातें थीं,

मेरा हर सवाल बिना लफ़्ज़ों के तेरा पढ़ जाना।


तू पास होती थी तो वक़्त भी ठहर-सा जाता था,

और तेरे जाते ही हर पल का सदियों-सा गुज़र जाना।


तेरी हँसी की गूँज अब भी मेरे कमरों में रहती है,

मगर तेरा उन रास्तों से हमेशा के लिए गुज़र जाना।


मैंने चाहा भी नहीं कि तुझे कभी इल्ज़ाम दूँ,

मुझे ही आता था हर दर्द को चुपचाप अपना बनाना।


अब कोई पूछे कि मोहब्बत आख़िर किसे कहते हैं,

तो तेरी यादों में मुस्कुराना... और तन्हाई में बिखर जाना।


बहुत याद आता है तेरा वो कातिलाना मुस्कुराना,

और मेरा तेरी मुस्कान पर हर बार दिल हार जाना।



( कुछ रिश्ते मुकम्मल होकर भी अमर नहीं होते,

और कुछ अधूरे होकर भी उम्र भर साथ निभा जाते हैं।)

शनिवार, 6 जून 2026

बिकते पर्चे, सिसकते ख़्वाब


​बिक जाते हैं पर्चे यहाँ, ईमान बिक जाता है,

मेहनत की स्याही पर, नोटों का साया मंडराता है।

अमीर की तिजोरी से यहाँ मुस्तकबिल तय होता है,

ग़रीब का बच्चा पढ़-लिखकर भी सड़कों पर रोता है।


​सालों की वो तपस्या, वो जागी हुई रातें,

धुएँ में उड़ गईं सब, वो हक़ की बड़ी बातें।

नेताओं की कुर्सी शांत है, अफ़सर मौन बैठे हैं,

लाखों सपनों की चिता पर, वो बेफ़िक्र सोए हैं।


​किताबों के पन्नों में जो इंसाफ़ पढ़ा था हमने,

वो बाज़ार के सन्नाटों में नीलाम होते देखा है।

दर्द इस बात का नहीं कि इम्तिहान रद्द हुआ,

अफ़सोस ये है कि हुक्मरानों को बेअसर देखा है।


​ऐ वक़्त! गवाह रहना इस सिसकती हुई जवानी का,

ये ग़ुस्सा महज़ आँसू नहीं, आग है किसी कहानी का।

जब-जब थकेगा युवा, तब-तब ये तख़्त डोलेगा,

आज ख़ामोश है जो, कल वो इंक़लाब बोलेगा।

किताबों में दबी बस्तियाँ


​वो जो छोटे से कमरे में एक रौशन दीया जलता है,

वहाँ रातों को जागकर, कोई अपना मुस्तकबिल बुनता है।

घर से दूर, अपनों से दूर, एक अनजानी सी डगर पर,

वो लड़का, वो लड़की, अपनी उम्र से पहले बड़ा होता है।

​बाज़ार की उस सूखी रोटी में माँ के हाथ का स्वाद ढूंढता है,

पॉकेट मनी के आख़िरी सौ रुपयों में पूरा हफ़्ता बुनता है।

तैयारी की इस धूप में, चेहरे की वो रौनक कहीं खो गई,

कमरे की दीवारों पर टंगे नक्शों में, वो अपना घर ढूंढता है।

​त्योहारों पर जब गाँव की ट्रेनें भर-भर कर जाती हैं,

तो बंद कमरे की खामोशी, आँखों में आँसू लाती है।

"इस बार नहीं, अगली बार आऊँगा माँ," कहकर जो फोन काटता है,

वो अपनी तन्हाई को, अलमारी की किताबों में छुपाता है।

​हर नाकामी पर दुनिया के ताने, पीठ पर गहरे घाव देते हैं,

जो खुद कभी नहीं लड़े, वो काबिलियत का हिसाब लेते हैं।

पर कोई नहीं देखता उन रातों को, जब सिरहाने भीग जाते हैं,

और सुबह फिर मुस्कुराकर, वो लाइब्रेरी की तरफ निकल जाते हैं।

​ये सिर्फ छात्र नहीं, ये एक उम्मीद हैं पूरे परिवार की,

इनकी आँखों में थकी हुई, पर ज़िंदा ज़िद है निखार की।

ऐ वक़्त! ज़रा अदब से गुज़रना इन तंग गलियों से,

इन कमरों में इतिहास छपा है, किसी की कल की जीत का। 

एक परदेशी की डायरी: शहर

​कुछ शहर अक्षर देते हैं भाषा को, कुछ खोलते हैं संसार के कई आवरण। ​कुछ शहर केवल प्रतिध्वनि बनकर दोहराते हैं हमारा नाम। ​परंतु इन सबसे इतर... ...