बुधवार, 29 जनवरी 2020

सर्दियों की अलाव

ढलती ठिठुराती साँझ
बाबा को अघाना जलाता छोटा भाई
घर के बाकी का भी आग जलती देख आ बैठना
हर शाम  अघाने के घेराव मे बीतने का दृश्य
कभी उसकी ठिठोली कभी मेरा मजाक
कभी कडव की पूणी जलाना
जिसपे अदरक वाली चाय देने आयी माँ का डाँटना
वो स्वेटर की छीना झपटी
फ़िर बाबा की कम्बल मे दुबकना
और बापू के भूतो वाले किस्से
जलती लकड़ी पे आग का इतराना
ये सोचकर कि कितने करीब है सब
तभी अचक से किसी का ठंडा हाथ
किसी के गालो पे चिपकाने से झगड़ना
और...
और उसपे मां का खाना खाने को आवाज लगाना
मेरा बापू और बाबा के साथ बैठे बैठे अघाने पर ही खाना
उस पर फ़िर मां के तानो मे मुस्कुराते बापू की हिस्सेदारी
देर रात जब तक बुझ न जाये आग सेंकना

जीवन तो वही था...
खूबसूरत बचपन ही था...

#दिल_जयपुरी

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