शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

पिता

#पिता

                   जब हमारी गाव मे पढाई पूरी हो जाती है तो अपने सपनो को उडान देने के लिए हम जयपुर या दिल्ली जैसे शहरो मे पढाई जारी करना चाहते है खासकर के हम मीणाओ के लडके लड़कियां. किसी ने कोई सपना देखा होता है किसी ने कोई सपना देखा होता है वास्तविकता मे वो सपने हमने सिर्फ देखे होते है उनको पूरा कराने का असली जुनून तो पिता की आँखों मे होता है .  वो सपना पूरा करने का लक्ष्य तो पिता ने निश्चित किया होता है हमसे ज्यादा. और एक मध्यम वर्गीय या गरीब परिवार मीणाओ के है ज्यादातर. सभी मीणाओ के घर मे कस्टम कलेक्टर आईपीएस नही है . है भी तो वो भी ऐसी ही स्थिति से गुजरे है . बात ये है कि जब हम पढाई जारी करते है शहर मे तो कमरा कॉलेज और कोचिंग की फीस पिता देता है और हमको ये पता नही होता कि उसने कहा से रुपयो की व्यवस्था की है . हमारा पिता ये नही चाहता कि हमको इन सब का पता चले क्यूकी वो सोचते है कि ये बात हमको मायने नही रखती , हमे सिर्फ पढाई ही मायने रखनी चाहिये. कोचिंग नही छूटती कभी मैथ की तो कभी इंग्लिश की ...तो कभी रीजनिंग की तो कभी साइंस की .....कभी रेल्वे के लिए तो कभी बैंक के लिए ..तो कभी एस एस सी के लिए. सबका कोर्स अलग अलग . कुछ लडके हर कम्पीटिशन की परीक्षा के लिए हर बार कोचिंग करते है . फीस 6000 से 25000/30000 पर हमको पता नही है पैसा कहा से आ रहा है . हमने तो बस पापा को बोला था . पापा कमरा का किराया देना है पापा मैथ की कोचिंग की फीस देनी है पापा खर्चा को पैसे खत्म होगे पापा पापा पापा...Always. और पापा के शब्द...बेटे कितने चाहिए. बेटा कहेगा 10000 बस. पापा कहेगा परसों डला दुंगा तो चलेगा . बेटा कहेगा पापा कल कोचिंग मे बैठने नही देगा टीचर. ठीक है बेटा दोपहर तक डला दुंगा.  दोपहर को फिस जमा हो जायेगी बेटे की अब बिना टेंशन के पढाई जारी रख सकेगा.
            कुछ वर्षो बाद जब बेटा कलेक्टर/कस्टम/जेइन/फईन/मास्टर/गैंगमेन/चपरासी कुछ भी बन जायेगा. पिता को लगेगा मेरा तो जीवन सफल हो गया . गाव मे मूंछो में ताव देकर घूमता है अब पिता क्यूकी उसको बेटे से जो उम्मीद थी पूरी कर दी .
              इन मूंछो के ताव को देखकर एक दिन जब बोहरा घर आता है कि ला अब तो गढ तोड दिया तेरे छोरे ने भाई म्हारा भी हिसाब कर लें . तब पिता कहता है कि हा भाई आओ कर लेते है बहुत शुक्रिया जो तुमने मेरा साथ दिया . हिसाब मे पता चलता है कर्जा 4 लाख/5 लाख/ 6 लाख /8 लाख जुडता है . बेटे को कहा जाता है कि बेटा पैसा देना है दूसरे का और बेटा के शब्द होते है - कौनसा पैसा . मैने तो अकेले खर्च नही किये पूरे. मै तो बस कुछेक लाख एडजस्ट कर सकता हूं खींच के .बाकी आप देख लो  . ये शब्द सुनकर बाप दिल बै़ठ जाता है . वो नि:शब्द हो जाता है .
                    अब उस कलेक्टर साब को क्या पता कि जो पैसे उसे भेजे जाते थे वो घर मे पेड से नही तोडे जाते थे. खेती मे इतना भी नही होता कि खाद बीज का खर्च चल सके . उसकी बीमार मां को जिन्दा भी तो आजकल की अंग्रेज़ी दवाईयो ने रखा है जो कितनी महंगी होती है उसे पता नही. उस बेटे को ये भी पता नही कि उसके छोटे भाई बहन को भी तो पढाया जा रहा है जिनका खर्च देने के लिए सडक पर कोई दान पेटी नही है . शायद उस बेटे को ये भी पता नही होगा कि 1 लाख रूपये का 3 साल मे 2 लाख हो जाता है जो कि 2 रूपिया प्रति सैकडा है तो वरना कुछ तो इससे भी ज्यादा मे बोहरगित करते है . और उसे शहर मे शानदार वक्त बिताते 5-8 साल हो जाते है . वो भूल जाता है वो महंगे महंगे कपडे वो शानदार एक हाथ लम्बा मोबाईल. परिवार की हर जरूरत पूरी की थी जितना कमा सकता था उससे घर का खर्च चला लेता था.  और क्या बताऊँ अब यार सब कुछ तो कह दिया.....

दुनिया मे पिता से बढा सलाहाकार; मार्गदर्शक; साथी; हर्षवर्धन करने वाला कोई नही होता ।
जिनके सर पर पिता का साया है वो भाग्यशाली है जिनके पर नही है उनको कामयाब व्यक्ति बनकर सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते है.

एक बात सीखी है जिंदगी मे ...कुछ भी करूगा पर ऐसा कुछ नही करूंगा जिससे पिता के दिल को ठेस पहुंचे. और गर्व है अब तक तो ऐसा नहीं किया.

और मै सिर्फ आज याद नही कर रहा रोज पिता को याद करता हूं . आज तो #असलियत लिखी है कुछ लोगो की .

उनको समर्पित है जिनके घर मे मूंसे ग्यारस कर रहे है और शहर मे R15 के पीछे भायेली बैठकर घूम री है ।

किस्मत

#किस्मत

एक लडका था जो 5-6वीं कक्षा तक गाव के ही एक प्राइवेट स्कूल मे पढा था.उसके बाद उसे सरकारी स्कूल मे दाखिला  दिलवा दिया. किरोडीमल जी के दोनो बेटे सरकारी स्कूल मे पढते थे अब. गोलू अपने बडे भाई दीपक के साथ स्कूल जाता था. गोलू पढाई मे बहुत अच्छा रहा है . किरोडीमल जी के विचार बडे ही सार्थक हुआ करते थे . उनका मानना था कि सरकारी स्कूल के टीचर ज्यादा अच्छे है वजाय प्राईवेट स्कूल के टीचरो से और सच भी है वो तो खुद नही पढाते है. गावो के सरकारी स्कूल के टीचर आराम ज्यादा करते है पढाते कम है. कुछ टीचर होते है जो अच्छे से अपनी ड्यूटी करते है

       खैर. इसी सरकारी स्कूल से राज्य की वरियता सूची मे नाम आया एक लडके का . कक्षा 12वीं के गोलू का. कला वर्ग मे राज्य मे प्रथम था 96.15 प्रतिशत के साथ. गोलू सामान्य किसान का बेटा था. तब सभी अखबार बालो ने झोपडी से निकला हीरा कहा था. पूरा गाव गर्व महसूस कर रहा था. किरोडीमल जी का सर फक्र से ऊंचा था कि बेटे ने आज एक अलग पहचान बनाई है. बाप का नाम रोशन कर दिया. समाज मे अलग ही इज्जत, पहचान बन चुकी थी उसकी. वो वक्त किरोडीमल जी के परिवार के जीवन का बेहतरीन वक्त था. उस वक्त गोलू ने सपना भी बडा देखा था कि आईएएस बनना है अब. पिता ने भी ठान लिया था कि जो सपना बेटे ने देखा है जान लगा दुंगा पूरा करने मे.
         गोलू ने राजस्थान यूनिवर्सिटी कालेज से ग्रजुएशन किया. जयपुर के मीणा हॉस्टल मे रहकर पढाई की. विषयो पर ऐसी पकड कि साथी God Gift कहते थे. उसका आईएएस बनने का जुनून कम नही हुआ .ग्रजुएशन की पहली साल से आईएएस की पढाई जारी कर दी.उसकी ग्रजुएशन खत्म होने के बाद वो दिल्ली चला गया और यूपीएससी का एक्जाम दिया .वह पहले एक्जाम मे सलेक्ट होकर इंटरव्यू तक पहूंच गया जो कि अपने आप मे बडी सफलता थी . उसका सपना था पहले ही एक्जाम मे फाइनल सलेक्ट होना. पर ये सपना उसका टूट गया था .उसे इंटरव्यू मे बाहर कर दिया गया.यही से उसके सपने मात खाते चले गये थे. पता नही क्यू लडका तो पढाई मे भी हीरा और दिल से भी हीरा था पर किस्मत ने उसकी उल्टी गिनतिया चालू कर दी थी . उसने फिर एक्जाम दिया सिलेक्शन नही हुआ.  3 यूपीएससी एक्जाम देने के बाद उसने पहला आरएएस का भी एक्जाम दिया और उसमे इंटरव्यू के लिए सलेक्ट हुआ. उसका 4 वीं बार आईएस का मेन्स दिया और दिल्ली से कमरा खाली करके गाव आ गया था. एक तो उसको ये आत्मविश्वास था की इस बार इंटरव्यू मे भी मुझे कोई नही रोक सकता. क्यूकी मेन्स का पेपर उसका बहुत अच्छे से हो गया था. दूसरा अब आरएएस का भी इंटरव्यू था जो उसे अब देना था कि आईएएस जॉब के बाद दे लूंगा. उसका जुनून गडबडा सा गया था. इतनी सारी असफ़लता और घर के हालात देखकर क्यूकी वो सिर्फ़ किसान का बेटा था किसी आईएएस या आईपीएस का बेटा नही जो पैसो की टेंशन नी होती. सब पैसा साहूकारों से आता था. सबको विश्वास था कि लडका एक दिन कलेक्टर बनेगा और पूरा हिसाब बराबर कर देगा. साहूकार सोचते थे कि दिन और रात तो हमारे आते है इसका तो जमाना आयेगा. इसलिए किरोडीमल जी को जितने चाहिये मिल जाये थे.
               दिसंबर 2014 की बात है उसका मेन्स का लास्ट एक्जाम रविवार को हो गया था।  सोमवार को वो कमरा खाली करके घर आ गया था. गाव मे मित्र 2-3 थे बस गिने चुने उन्ही के घर सारा दिन-रात निकल जाता था उसका.मंगलवार शाम को वह दोस्त के घर से दोनो अपने घर चले गये. टीवी देख रहे थे सब करीब 8 बजे शाम को. गोलू का मोबाईल डिस्चार्ज हो गया था. वो टीवी के प्लग मे ही मोबाईल का चार्जर लगाने लग गया. नही लगा चार्जर. थोडा दाब देकर लगाना चाहा तभी एक झटका लगा और जमीन पर धडाम से गिर पडा. सब घरबाले उठाने को भागे . जीप बुलाई डॉक्टर के पास ले के गये सिर्फ 3 किमी था डॉक्टर. पहुचते ही I'm sorry बोल दिया डॉक्टर साब ने.
          उस दिन समझ आया कि किस्मत बडी कुत्ती चीज है साली कभी भी पलट जाती है.

(यह मेरे गाव की सत्य घटना है.)

बिकते पर्चे, सिसकते ख़्वाब

​बिक जाते हैं पर्चे यहाँ, ईमान बिक जाता है, मेहनत की स्याही पर, नोटों का साया मंडराता है। अमीर की तिजोरी से यहाँ मुस्तकबिल तय होता है, ग़रीब...