शनिवार, 10 जून 2023

इंतजार और बेरुखी

दशकभर का इंतजार और फिर उसका खत आया, 

एक अरसे बाद आवाज सुनी और मैं सन्नाटे सा कंपाया। 


फिर वाणीरस बरसा और मैं जैसे धोरों पर बादल इठलाया, 

नाउम्मीदी में उम्मीद बढ़ी जैसे सूखे दीपक में तेल बढ़ाया। 


मैंने भी खूब किया सत जैसे रब ने कोई उपकार किया, 

वह ठहरी अब भी पगली उसको ना समझ 'ठहराव' आया। 


फिर सुना कानों ने वह जिसकी यकीनन उम्मीद ना थी, 

वह गयी फिर ऐसे जैसे कभी आई ही ना थी। 


अब, 

कौन उसे समझाएं हर बार वक्त ना इजाजत दे, 

कौन कहे रब हर बार न कोई अवसर दे। 


कौन कहे मैं वही मिला जहां उसने छोड़ा था, 

और कौन कहें कि आंचल में भी सिर रखकर मुझको रोना था। 


कौन कहे दुनिया ने सुख बांटे दुख ना कोई बांट सका, 

जब बारी आई मन खोलन की मैं उसको ना रोक सका। 


दशकभर का इंतजार और फिर उस का खत आया, 

एक अरसे बाद आवाज सुनी और मैं सन्नाटे सा कंपाया।


दशकभर का..... ।



- दिल जयपुरी

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