बुधवार, 29 जनवरी 2020

जर्नी

#जर्नी

जन शताब्दी मे ईत्ती भीड़ मैने कभी ना देखी .
भाईसाब पैरो ने मना कर दिया फ़रीदाबाद आते आते तो कि हम खड़े ना रह रहे अब , थक चुके है पूरी तरह.  तार तार हो चुकी है जाँघ और पींढी की सब नसें . बड़ी माथापच्ची के बाद निजामुद्दीन तक खड़े रहने को राजी हुई. तारा भाई बोल रहे है निजामुद्दीन पर Metro नही है बस से आना पड़ेगा मखै ना .  अपुन को Metro मालिश मान्गता है आज . बाहर चेक किया तो गेट के बाहर Metro , यार आप अब झूट भी बोलते हो.

Metro Station पर फ़र्श पर बने ये येलो/मैजेंटा कलर के पग आपको एैसे ले जाते कि अगर आपने इनसे पैर हटा लिया तो दिल्ली Metro की गारंटी नही है कि Destination पर तुम पहुच ही जाओ.  अपनी रिस्क है तुम्हारी.  मै ये ही सोचकर पग पे पग रखकर चल रहा था लोग मुझे देख रहे थे कि बंदा लगा के आया है या... 😜.   इत्ते मे  येलो पग की कतार के बीच मे  डिवाईडर आ गया. 

- मखै हटाओ इसको मै खो गया तो. 
सिक्यूरिटी वाला बोला -
सर आप इधर से आ जाओ .
-अबे जब उधर से जाना था तो ये पग बिना घुन्घरू के इधर से क्यू निकाले उधर से ही निकालते ना. 
बोला -
सर केजरीवाल की गलती नही है  कांग्रेस थी  सत्तर साल से. 
मखै -
तुम भेन्चो अब  ये  लाईन लाईन  खेलने  केजरिवाल को बुलाओगे. अच्छा खासा चल रहा है उसका मेमे मार्केट उसे परेशान क्यू करना.
ठीक है उधर होकर निकल लुंगा मै तो पर ये ठीक बात नहीं है भाईसाब.
पैसेंजर को तो उल्टा गुमराह ये एक हाथ चौड़े पग कर रहे है. और एक बात बताओ. ये इतने  चौड़े पैर किसके होते है भई. आम इंसानो के तो होते नही.  राहुल गांधी का पता नहीं. 
- सर राहुल गांधी भी आम आदमी ही है.
- यार  तुम फ़िर केजरिवाल को बीच मे ला रहे हो.
-सर वो तो आप लेकर आये थे. 
-चल छोड़ अब तू ये छ महीने से कार्ड यूज नही किया चलेगा.
-सर दौड़ेगा आप की ही सरकार है.
-साले फ़िर तू केजरिवाल को घसीट रहा है तुझसे तो मुह लगना ही बेकार है.
जैसे तैसे T3 आ गया मै. इधर बाहर निकलते टाइम लेफ़्ट मे दिख गया पिछली बार जिसे टिकट काउन्टर समझा था वो दारु का ठेका निकला था. ठेका तो ठेका ही होता है चाहे सोने की छड़ो के पीछे हो या लोहे के सरीयो के पीछे. गैप हाथ घुसाने और एक बोतल बाहर निकल सकने लायक ही रहेगा.

भाईसाब इतना बडा Airport है कुछ दिन पहले अखबार मे पढा था कि दुनिया के पांच सबसे व्यस्त Airport मे है. ये ध्यान आते ही फ़ीलीन्ग अमीरपणा . इत्ते मे पापा का कॉल आ गया.
- पैसे डाल देना कतई चाय पीवे कू भी नही है.
अकाउंट चेक किया  चार सौ पचपन थे भाईसाब. मखै -
पापा मै नही खेल रहा यार. कल तनखा आयेगी तब देखते हैं.  सडनली फ़ीलीन्ग दुनिया का सबसे बडा गरीब. मन किया यही कटोरा लेके बैठ जाऊ.
 अंदर आने के लिये गेट मे घुसने लगा तो सिक्युरिटी वाला बोला -
 लाला Pass वाले निकलै यामे होके.  तू पीछै वाली लाईन मे लग के निकल.
- कतई जाट लग रहा था हरियाणा का मखै यही मारेगा कै भई.

मिडिल क्लास वालो की ये ही प्रोब्लम  है. पढ़ा भी नही जो लिख रहा था. जैसे तैसे अंदर आ गया. चेक ईन तो नयी दिल्ली करा ली इस बार.   वही दे दिया कोथडा अपना.  इधर सीधे अंदर ही घुसना है.
इस बार गेट सिक्युरिटी चेकिन्ग पर पूरा लिखा हुआ पढ़ा फ़िर एक ट्रे लेके सामान रखा उसमे. दो फोन,  पावर बैंक, डाटा केवल, बेल्ट,  पर्स फ़िर सरका दिया एक बोल रहा था -
भाईसाब आपमे ज्यादा वजन है या इनमे. 
मैने कहा
-भाई तेको क्या लगता है.
इतने मे मच्छर मारने के रैकेट को इधर उधर घुमा के SI बोला कि -
Level U ना रखी लाला ट्रे मे, 
-उरे...  तभी मै सोचू ट्रे मे जगह खाली कैसे रह गयी थोड़ी सी .  पहले जो वजन की पूछ रहा था वो देखकर मुस्कुराया कि लाला का बस ना चला वरना गोज्या मे ही कम्पोटर धर के लाता ये पक्का.
यहा आके लग रहा था देश बडा खूबसूरत है अपना. हर तरफ़ आग लगी पड़ी है भाईसाब. पर अमीर लोगो मे गरीबी देखनी हो तो या तो CP या airport आओ. विभिन्न प्रकार की गरीबी देखने को मिलेगी.
सीट तो window है पर बीच की चार सीट आर पार खाली है.  उधर लास्ट मे ताऊ बैठे है. इतनी सिन्गलता तो गान्धी की जिन्दगी मे भी ना थी जितनी मेरी मे है आजकल . उपर से एयर होस्टेज  Male है आज. रात मे Male एयर होस्टेज  का मतलब समझते हो ?. मतलब कुछ नही है मुझे अपनी किस्मत पर भरोसा है.  देखने का सुख भी ना देती मुझे तो कि जी भर के देख लिया तो अनर्थ हो जायेगा मानो. जबकी किस्मत को खूब पता है कि हाथ में कोई दोष नही है मेरे मे. आंखों को मै कंट्रोल मे रखता हु फ़िर भी.
" कृपया बैठे हुये कुर्सी की पेटी बांधे रखिये " मै ढूँढ रहा हू पर मिल नही रही है. इतने मे वो ही Male आया  और बोला सर सीट बेल्ट लगा लो प्लीज.  पेटी क्यू बोलते हो सालो हमे सूट ना करते ये वर्ड.  हमे बेल्ट ही चाहिए.
और ये लिखते लिखते चेन्नई आ गया भाईसाब.  मखै मात्र तीन हजार खर्च करके  तीस घंटे बचा लिये लाला. पर अभी चार सौ और देने है रात को लोकल ना मिलेगी घर तक. पैसा डॉलर के बराबर होता तो मै सिक्को मे खेलता भेन्चो एक एक रुपया के मे .😂😂

#दिल_जयपुरी
#दिल_का

जब महसूस होता है कि तुम्हारा किसी के प्रति बहुत सारा प्यार उसके द्वारा छोटे छोटे हिस्सों मे बाटां जा रहा है या फ़िर जो मोहब्बत पहले थी, पहले मतलब अभी कुछ कल शाम तक , उसके बिखरने जैसा लगता है तो तुम सबकुछ सम्भालना चाहोगे कि कुछ भी तितर बितर ना हो. वरना मोहब्बत, प्यार , अपनापन एक एसी चीज है कि समेट पाना मुश्किल होता है हो सकता है ताउम्र समेट भी ना पाओ. मैने कभी नहीं सोचा कि इस तरह का बदलाव एक ही शाम मे आयेगा.  आज लग रहा है कि या तो मै गलत हू या वो क्यूकी एक तो गलत होता ही है हमेशा , या फिर , हो सकता है नासमझ हो उसकी.  जो भी है खोना मुझे नही आता क्यूकी हर इंसान को मोहब्बत देना मेरे वश की बात नही है लेकिन जिसको की है उसे दूर कर देने की ताकत भी मुझमे नही है चाहे पहल मे वो जो भी करे मुझे अपनो के वार सहने की आदत है . किसी न किसी रूप मे सहता आ रहा हू लम्बे समय से.

बदलाव मतलब कल तक जो जिद करे किसी बात पे आज अचानक से सहमत हो जाये ये तो आसान नहीं था उसके लिये फ़िर क्यू.  सीधा सा हिसाव है मन में कुछ तो बैठ गया है या तो मेरा मजाक या हालातो की समझ हो गयी है.  दोनो मे से जो भी है मुझे पसंद नही.  जिस तरह दिमाग मे बैठी नकारात्मकता अच्छी नही लगती ठीक उसी प्रकार मै ये भी कबूल नही पाउन्गा कि वो जिद्दीपना छोड़कर  इनोसेन्ट बन जाये. क्यूकी मुझे उसी मे पसंद है वो.  मुझे वही अवतार पसंद है उसका.  मुझे वही बचपना पसंद है उसमे.  मुझे वही बात बात पे लड़ना पसंद है.  एसे होते है हमारे जीवन मे बहुत सारे अपने जिनका अच्छा बन जाना हमे अच्छा नही लगता बिल्कुल वैसे ही जैसे अच्छे लोगो का बुरा बन जाना पसंद नही आता.

किसी जमीन की प्रकृति को दो भागो से समझ सकते है . एक थोडा उँचा वाला भाग जहा पानी रुक नही पाता और नीचा भाग जहा जाकर भर जाता है.  एक ही जमीन पर  एक ही प्रकार के बीजो मे जब आधे बीज नीचे बहकर चले जाते है इस तलाश मे कि पानी ज्यादा मिलेगा शायद तो वो सुखी रहेंगे या खुश रहेंगे. ये जमीन के दो भागो की ही तरह बंट जाते है.  उँचाई पर उगे पौधे हष्ट पुष्ट रहते और नीचे वाले रहते तो ज्यादा पानी मे है पर उपर अच्छी सेहत दिखती है जबकी नीचे सड़ जाते है ज्यादा पानी की वजह से जिसे वो किसी से बयां भी नही कर पाते क्यूकी बाकी से अलग हुये थे. ठीक इसी प्रकार उन्चाई वाले अच्छे लोग अपने हो जाते है और नीचे वाले बुरे अपने हो जाते है जिन्होने खुद रास्ता चुना होता है जिनको शायद अपना कहना भी गलत लगता है एक दिन .

मै अपनी जिन्दगी मे किसी अपने को इतनी आसानी से नीचे बहकर नही जाने देता. रोक लेना अच्छी बात है क्यूकी फ़िर जुड़ पाना भी सम्भव नही हो पाता है कभी कभी. जुड़े रहने की कोशिश करनी चाहिए . उसके लिये कुछ गवाना पड़े तो फ़र्क नही पड़ता. हम वस्तुये गवा सकते है वापस मिल जाती है पर अपनापन गवा दिया तो वापिस नही मिल पाता. मिल भी जाता है तो उस स्तर का कभी नही मिल पाता जिस स्तर का खोने से पहले होता है .

#दिल_जयपुरी

सपनो के सौदागर

बात 2008 की है मैं जब 9th मे था. एसे ही एक दिन लंच मे घर से खाना खाकर आए हम. घर के पास ही स्कूल हुआ करता था तो घर ही खाने आ जाते थे टिफिन साथ मे लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. वापस आते टाईम हम कई दोस्त साथ मे आ रहे थे. मैं और एक दोस्त थोड़े से पीछे रह गए क्युकी हम धीरे धीरे चल रहे थे बाकी से तो पता नहीं क्यु एसे ही मेरे मन मे कुछ आया और मैं दोस्त से बोला कि यार ऐक्टर बनने के लिए क्या ज़रूरी है मतलब कोई अभिनेता बनना चाहे तो उसके पास क्या होना मायने रखता है. उस वक़्त इतनी समझ हममे नहीं हुआ करती थी बस इतना ही थी स्कूल से घर घर से स्कूल यही जिंदगी हैं और फ्री टाईम मे घर मम्मी-पापा से छुपा के दोस्तों के साथ खेलना क्युकि किसी भी पैरेंट्स को बच्चों का खेलना बिल्कुल पसंद नहीं होता था गाव में क्युकी उनका मानना था कि ये बस पढ़े लिखे अच्छे आदमी बने यू खेलने के पीछे कहीं किताबों से मन ना भटक जाए. तो वो दोस्त बोला कि देख ऐक्टर बनने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि पैसा हो आदमी के पास और दूसरा सबसे जरूरी है बॉलीवुड मे दो चार पक्के मित्र या रिश्तेदार हो जो काम दे दे फिल्म बगैरा मिल सके और तीसरी जो है वो ये बात है कि उसपर ऐक्टिंग आनी चाहिए. मुझे ये पता नहीं था कि मैं क्यू पूछ रहा हू बस एसे ही पूछ लिया कि ये लोग कैसे वहा तक पहुचते होंगे बिल्कुल एक एसे सवाल की तरह जिसका बस जवाब जानना होता है जैसे हिन्दी के टीचर को इस बात से मतलब नहीं है कि याद समझ के किया या रटंत विद्या चलाई है. जवाब मुझे मिल गया था पर मन ये फिर इसी जवाब से एक और सवाल पैदा हो गया कि इसने ऐक्टिंग को तीसरे नंबर पर क्यू रखा. खैर उस उमर मे इतना जवाब मिल गया काफी था पर मैं इस पैदा हुए सवाल को आज तक नहीं भूला शायद ये बात मुझे इसी सवाल की वज़ह से याद है.
अब जब सिल्वर स्क्रीन पर पंकज त्रिपाठी नवाज भाई जैसे अभिनेता दिखते है जिन्होंने खानदानी अभिनेताओं की वाट लगा रखी है तो समझ आता है कि ना पैसा चाहिए ना रिश्तेदार जो काम दिला सके सिर्फ टैलेंट चाहिए. काम तुम्हारे पास खुद चलकर आयेगा. दूसरा बात ये भी कि जो करना है ना, वो कर डालो. चाहो जो भी करना हो.  पैसा काम दिला दे जरूरी नहीं है पर मेहनत का वक़्त जरूर आता है.

#दिल_जयपुरी

सपनो की बली

जिस उम्र मे एक व्यक्ति सपने देख और समझ सकता है, सम्पूर्ण उर्जा के साथ पूरा करने का प्रयत्न कर सकता है, लीक से हटकर करना चाहता है, उम्र का वह हिस्सा पढ़ाई और रोजगार की तलाश मे खत्म हो जाता है. मानता हूं पढ़ाई जरुरी है रोजगार भी जरुरी है. पर आपको ये भी मानना पड़ेगा कि सपने दबाना मतलब खुद के साथ ही कही न कही नाइंसाफ़ी है . एक युवा का सिर्फ़ सरकारी या प्राइवेट नौकरी करना ही सपना नही हो सकता. जिनका होता है उनका जीवन बीत जाता है बस पर कुछ कम मात्रा मे ही एसे होते है.  ज्यादातर लोग कुछ करना चाहते है जीवन मे जिससे उनके मन को संतुष्ट कर सके वो.  हर सरकारी नौकर ने ख्वाहिशे दाव पर लगाई है मजबूरियो को गिनकर या फ़िर वो ख्वाहिशो को जिन्दा रखना नही जानते. रोजगार के बाद सब कम्फ़र्ट जोन मे चले जाते है और ये एक एसा जोन है जिसमे जाने के बाद सिर्फ़ वो ही बाहर आ सकता है जिनको जिन्दगी से किक चाहिये. जो सोचते हैं बहुत खेल लिया जिन्दगी ने हमसे चलो अब हम जिन्दगी से खेलते है. अक्सर एसे लोगो को मंदबुद्धि कहते है. बाद मे पता चलता है कि उस बंदे ने कुछ एसा कर दिखाया कि हम सोच भी नही सकते. अपनी उर्जा की शक्ति पहचाना बड़ी बात है.  उससे बड़ी बात है उस पर रिस्क लेना . जो ले लेता है वो जीत जाता है या हार भी जाता है ये अलग बात है पर उसके लिये हिम्मत दिखाना बड़ी बात है. हर कोई रिस्क लेने से डर जाता है इसीलिये कम्फ़र्ट जोन से बाहर कोई नही आता. क्यूकी उससे बाहर हमेशा रिस्क है. लाईफ़ मे कुछ होगा या नही होगा ? जोब तो जिंदगीभर रहेगी पर सिर्फ़ गिटार बजाने मे फ़्यूचर कहा है? या फ़िर बिजनेस की सोचने वालो के दिमाग मे आता है चलेगा या नही ? बगैरा...

परंतु...  ये भी सच है कि....
जिसको  बिजनेस खडा करना है वो वो ही करके रहता है चाहे कुछ भी उसे करना पड़े उसके लिये,  जिसको राजनिति मे जाना है वो जरुर जाता है कितनो ने अच्छी खासी सरकरी नौकरी छोड़ दी इसके लिये, जिसको समाज सेवा करनी है वो जरुर करता है बिना किसी भेदभाव और मतलब के,  जिसको V Prodection की तरह सपने देखना है वो सपने देखता भी है पूरा भी करता है और एसे लोगो को ना तो कोई रोक पाता है ना ही ये अपने आरामदायक जीवन की कल्पना करते, ना ही सोसाईटी की बातो से फ़र्क पड़ता है और ना ही रिस्क लेने से डरते है. अंत मे विजयी सफ़लतम व्यक्तियो मे गिनते है फ़िर एसे लोगो को वो जिन्होने अपने कम्फ़र्ट जोन वाला कमरा नही छोड़ा कभी असफ़ल होने के डर और रिस्क नही लेने की कमजोरी से.

कहने का मतलब आज भी वो ही है जो कल था कि जो करना है ना, वो कर लीजीये वरना साँसे तो कम होती ही जा रही है एक दिन खत्म भी हो जायेंगी. कम स कम मलाल तो नही रहेगा. जीवन मे आत्मसंतुष्टी बहुत ज्यादा गहराई वाली बात हो जाती है जो कम लोगो को ही मिलती है.

#दिल_जयपुरी

सर्दियों की अलाव

ढलती ठिठुराती साँझ
बाबा को अघाना जलाता छोटा भाई
घर के बाकी का भी आग जलती देख आ बैठना
हर शाम  अघाने के घेराव मे बीतने का दृश्य
कभी उसकी ठिठोली कभी मेरा मजाक
कभी कडव की पूणी जलाना
जिसपे अदरक वाली चाय देने आयी माँ का डाँटना
वो स्वेटर की छीना झपटी
फ़िर बाबा की कम्बल मे दुबकना
और बापू के भूतो वाले किस्से
जलती लकड़ी पे आग का इतराना
ये सोचकर कि कितने करीब है सब
तभी अचक से किसी का ठंडा हाथ
किसी के गालो पे चिपकाने से झगड़ना
और...
और उसपे मां का खाना खाने को आवाज लगाना
मेरा बापू और बाबा के साथ बैठे बैठे अघाने पर ही खाना
उस पर फ़िर मां के तानो मे मुस्कुराते बापू की हिस्सेदारी
देर रात जब तक बुझ न जाये आग सेंकना

जीवन तो वही था...
खूबसूरत बचपन ही था...

#दिल_जयपुरी

कही तो हमारा मिलना होता

कही तो हमारा मिलना होता
किसी कहानी मे ही सही ...
पर मै भी आज तक एसी कोई कहानी भी नही लिख पाया जिसमे मिलना तय हो. हर जगह बिछडना क्यू लिख देता हूँ खुद पता नही. कोशिश करुन्गा यदी आगे कोई प्रेम पर कुछ थोड़ा बहुत लिख पाया तो. भावनाये लिख कर ही सही काल्पनिक तौर पर ही सही पर एकबारगी तो महसूस कर सकून्गा वो सब जो असल मे नही कर पाया कभी. जो मै करना चाहता था जैसा मै जीना चाह रहा था जैसा मै साथ रहने का ख्वाब पाले हुये था वैसा सब ...अब बस कहानियों मे ही जी सकता हू.
जीवन का कोई भी हिस्सा हम दुबारा नही जी सकते बिल्कुल गुजरे वक्त के माफ़िक वापिस नही आता कुछ भी. जैसे बचपन को दुबारा जीना हो तो यादो के सहारे हम बस महसूस कर सकते है. कोई बेहद दिल के करीब किस्सा हमारे साथ उसी तरह हो जिस तरह पहले हुआ था इत्तेफाक होगा और इत्तेफाक जीवन मे कम ही होते है. इक उम्र होती है जब इंसान प्यार मे जी रहा होता है वह जिन्दगीभर उसी मे जीना चाहता है. वह चाहता है आज जो सब उसके पास है वह आजीवन रहे पर अक्सर ही होता है एसा कुछेक भाग्यशाली लोगो के साथ वरन ज्यादातर के साथ उसके जीवन के सुखद पल छीन लिये जाते है. प्रकृति का नियम थोडा अटपटा लगता है तब कि हम जो चाहते हैं वह होता क्यू नहीं है जिन्दगीभर हमे संघर्ष क्यू करना पड़ता है क्या आराम की जिन्दगी जीना गुनाह है और आराम का मतलब यहा सिर्फ़ इतना सा है कि जिसके साथ जीने का मन हो उसके साथ ही बाकी की जिन्दगी निकले बस. दिल का खुश रहना उसके संतुष्ट रहने के बिल्कुल समानुपातिक होता है. मन उतना ही साफ़ और स्वस्थ रहता है जितना वो संतुष्ट रहता है.

#दिल_जयपुरी

जिंदगी में सब जुंआ है

जिन्दगी मे...

हर सांस जुंआ है...
हर सुबह जुंआ है... हर रात के बाद
हर दूसरी धड़कन जुंआ है...  पहली धड़कन के बाद

किसको पता है

सांस कौनसी आखिरी होगी ...
कौनसी रात आखिरी होगी ...
कौनसी धड़कन के बाद ... दिल दुबारा नही धड़केगा

ये सब
जुंआ ही तो है ...

एक एसा खेल जिसे खेलते हम नही है ,
       पर हार जीत हमारी ही होती है.

खुद को देखना छोड़ दो... तो दुनिया बच जाती है...
और  दुनिया को देखता है तो खुद अधूरा रह जाता है इंसान...

#जिन्दगी_के_बड़े_रगड़े_है_जी

#दिल_जयपुरी

आसमां भर दुनिया...

जितना आसमां हम देख सकते है
हमारी दुनिया उससे ज्यादा नही हो सकती
 जितने तारे आसमां मे है शायद वो सब जिद्दी होंगे इसीलिये सितारे बन गये और जमीं के अधूरेपन को महसूस करते होंगे.
जो जिद्दी नही होते वो कुछ खास कर नही पाते है आजीवन. जिद इंसान को आसमां बडा देखना सिखाती है.

ये दुनिया जितनी छोटी समझते हो असल मे उतनी है नही और जितना बडा तुम कालचक्र को समझते हो वो असल मे उससे भी बडा है.

आसमां के सितारे (जितने हम देख सकते है) और जमीं के पागल ( जिद्दी )इंसान एक दूसरे की तुलना मे काफ़ी लगते है पर जमीं पर कम ही मिलेंगे नगण्य भी कह सकते हो क्यूकी पागल कोई बनना ही नही चाहता.
पागल बनने का एक फ़ायदा है, वह दूसरो को है कि वो किसी से शिकायत नही करता बल्कि बड़ी से बड़ी समस्याओं का तोड़ उसके पास होता है जिनसे धरा के नियम भी बदलने जैसे आव्रति होती है.

पिछली रात एसे ही मन मे ख्याल आया  कि  अगर खुद सितारा होता तो क्या होता या कहा होता या क्यू होता...  मै बालकनी से सप्तऋषि मंडल कहे जाने वाले तारो के झुंड को देख रहा था ( जो कि एक प्रश्नवाचक चिह्न की आकृति के भाँति दिखता है. बचपन मे मां ने बताया था कि आसमां की सबसे खूबसूरत जगह यह है) तो मैने खुद को वहा होना पाया. क्यूकि मुझे भी आसमां का यह हिस्सा बचपन से पसंद है.

#दिल_जयपुरी

At मरीना बीच

#मरीना_बीच_चेन्नई

- बची हुई गुल्ली(मक्का)  को कौअा खा रहा है देखो
- श्मशान घाट मे भी अपने हिस्से का चावल नही छोड़ते ये.

- मतलब
- कुछ नही

- अवे पानी मे इतना अंदर क्यू जा रहा है.  मरेगा क्या . समंदर है ये वहा ले जायेगा.
- वहा तक गहरा ज्यादा नही है. भीग लेने दो थोडा. वैसे भी एक दिन सबको मरना है.  और मरने के बाद body बाहर फ़ेन्क देता है समंदर पता है ना.

- तेरी मम्मा कैसी है अब उनकी तबीयत खराब थी ना.
- पता नहीं. चार पांच दिन से बात नही की.

- पता तो होगा.
- छोटा भाई है उसके पास.  सो कोई टेन्शन नही है.

- क्यू
- वो लापरवाह नही है. और एक दिन तुम भी मै भी वो बच्चे भी और वो बूढा वहा जो अपनी पोती के साथ खेल रहा है सब को ये दुनिया छोडनी ही है.

- तु पगला गया है क्या.  हर बात पे  मरना कहा से आ जाता है बीच मे.
- क्यू इसमे क्या गलत था.

- सही गलत मत सिखा.  उम्मीद होती है जीने की बस.  और उसी पे दुनिया चल रही है.
- उम्मीद...  जिन्दा लोगो को मारती है. अगले पल का भरोसा नही.  उम्मीद क्यू पालते है लोग पता नही.

- तू ना किसी अच्छे साईक्लोजिस्ट को दिखा. तेरा दिमाग ठीक नही है.
- अरे एसा कुछ नही है.  बस मै सच को दिल से कुबूल करता हू.  मुझे फ़र्क नही पड़ता किसी भी चीज से  . जीना मरना, दुख सुख,  जुड़ना बिछडना.  सबकुछ मेरे लिये एक समान जिन्दगी के हिस्से लगते है.  जो कि है भी. पर सब डरते है इसे मानने से जबकी सबके मन को पता है सच्चाई.

- तुझे नही लग रहा ये ज्यादा हो रहा है. ना जगह देखता ना वक्त देखता ना कुछ और बस जो मन मे आया बक दिया.
- हा चलो अब रात हो जायेगी घर पहुचते पहुचते....

#दिल_जयपुरी

अधूरापन

कुछ चेहरे होते है जिन्हें हम ता-उम्र नहीं भूल पाते कुछ होते हैं जिनको भूलना नहीं चाहते. एक होते है दर्द बांटने वाले एक होते है बांटने की आड़ मे बढ़ाने वाले. बढ़ाने वाले ज्यादा मिलते है. धीमा जहर भी कह्ते है कुछ लोग जिसे. दूसरी तरह के लोगों का जीवन मे कोई खास मकसद नहीं होता सिवाय इसके कि उनको आनंद समय पर मिलता रहे जिसके लिए हर बात को मसालेदार बनाना जरूरी होता है. ताकि सुनने वालों के कान मे रेंगती जुआ जरा रफ़्तार बढ़ाए अपनी.
बात ये है कि यदि हम दूसरे प्रकार का जीवन जीते है तो इस बात से मुकर नहीं सकते कि जिंदगी लूजर के जैसे काटने से ज्यादा कुछ नहीं है. जिनके खुद के जीवन मे रोशनी नहीं होती वो दूसरों के घरों का दिया बुझाने मे माहिर होते है. ये दूसरी तरह के होते है. किसी की सोच को बदल पाना जितना मुश्किल है उतना ही आसान है वह खुद को समझ पाये. जो कि अक्सर होता नहीं है क्युकी हर आदमी अपनी नजर मे सही है. अपनी नजर मे सही होना भी एक स्तर तक ही सही होता है उससे उपर यदि कुछ आता है तो उसे अमूमन गलतफ़हमी कह्ते है. मानसिक बीमारियो की वज़ह भी गलतफहमियां बनती है. इसी तरह की बीमारियो के पीड़ित होती है बलात्कारी किस्म की सोच. हर व्यक्ति के अंदर बुराई और अच्छाई युद्धरत होती है एसा सुना होगा पर य़ह सच है. कुछ होते हैं जो काबू पा लेते है कुछ होते है जिनकी बुराई से दूसरे लोग प्रभावित होते है...

इससे आगे तुम सोचिए कुछ अधूरा लिखने का मन है. अंत मे अधूरापन छोड़ने का मन है.

दिल जयपुरी

दिल का 2

#दिल_का
ये बिज़ली के तार कहा तक जाते होंगे. य़ह बिज़ली आती कहा से है. पत्थर कभी खत्म नहीं होगा क्या इस धरती से क्युकी ये तो बनता नहीं है मशीन से. बचपन मे एसे ही अनगिनत सवालों के साथ एक मुस्कान उसे देखकर भी आती थी कि आगन के उधर वाले कोने से और काकी के घर के ठीक उपर से रोज देर शाम को एक चीलगाड़ी गुजरती है जो अपने पीछे एक लम्बा सा धुआं का रास्ता छोड़ती जाती है जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि बहुत दूर से आयी होगी सच मे य़ह. बिन वजह के हमेशा मुस्कान बिखेरे होंठ. पेप्सी के ढक्कन की फिरकी भी बनाने का अलग ही लेवल का अनुभव रहा है. खिलौने भी तो सिर्फ वो ही होते थे ना जिन्हें हमने या मम्मा ने हाथ से बनाया हो मिट्टी या लकड़ी के खिलौने. मैं गत्ते की गाड़ी बहुत अच्छी बनाता था और फिर उसे देखकर मेरा छोटा भाई जलता था फिर वो ट्रिक उसने मेरी गाड़ी देखकर ही सीख ली और उसने भी ठीक वैसी की वैसी चार पहियों वालीं गत्ते की गाड़ी बना दी. मैंने भी सबकी तरह बाबा और बाऊ से बहुत किस्से कहानिया सुनी है जो अब तक मुझे याद है.
मै हमेशा से आजाद ख़यालात वाला रहा हू. मैंने अपने विचारो को बांधकर नहीं रखा कभी ना बचपन मे ना अब. बचपन मे एसे ही विचारो की वज़ह से खूब बापू के हाथो ने इज़्ज़त बरसाई है पीठ पर. अब जब ना कोई लड़ने वाला है ना कोई रोकने वाला है ना कुछ एसा की किसी से मांगना पड़े पर सब अधूरा रह जाने का सा लगता है. सब कुछ पीछे छूट  जाने सा लगता है. अब जिंदगी एक समस्या से सुलझते उलझते गुजरे जा रहीं है.
 सरकारी नौकरी लग जाती है पर उसके एक समय बाद लगता है कि सच मे गुब्बारे मे रखा रसगुल्ला चूस रहे है हम. एक नजरिये से देखा जाए तो अच्छा जीवन उसी का रह गया है जिसके पास सरकारी रोजगार है दूसरे की नजर मे परंतु जहा तक मैं सोचता हू तो सरकारी नौकर का मानना होता है कि वो ये बनने के बाद वह किसी भी प्रकार की समस्या नहीं चाहता जीवन मे किसी भी प्रकार का संघर्ष वो नहीं कर पाएगा इसीलिए उसे नौकरी की जरूरत है. वह सिर्फ उतना ही करना चाहता है जितना उससे कहा जाता है. सबका अपना नजरिया है खैर. मेरा नजरिया नकारात्मक और सवालात वाला है थोड़ा पर उसका मुझे कोई अफसोस नहीं है बल्कि मैं भी सरकारी नौकर हू.

सांसे रुक जाती है वक्त नहीं रुकता. उम्र निकल जाती है डील डल हो जाता है. पैदा होने से रोजगार पाने से ठीक पहले तक का वक़्त सबका अपना वक्त होता है जो उसने अपने लिए दिया होता है. जिसमें अपनी तरह का थोड़ा जिया होता है. उसके बाद आजीवन खुद के लिए वक़्त नहीं होता इंसान के पास. मुझे पता नहीं है आज कहना क्या चाहता हू पर मन मे एसे ही कुछ चल रहा है जिससे खुद अनभिज्ञ हू फ़िलहाल मैं.

#दिल_जयपुरी

दिल का...

#दिल_का
साल बीतने को है और जहा इस के प्रारंभ मे पहले दिन मैंने खुद को इसके अंत मे देखना सोचा था वहा तक पहुच नहीं पाया. पूर्णतः असफल रहा इस वर्ष मैं. वज़ह खुद हू. वक़्त को दोष नहीं दे सकता क्युकी मुझे पता है कि कोई भी काम आसान नहीं होता और सम्पूर्ण रूप से उसमे शत प्रतिशत देना बहुत ही जरूरी है चाहे जो भी आप करना चाहो. शत प्रतिशत दे नहीं पाया. इसकी वज़ह मेरा आलसीपन भी है इसकी वज़ह मेरा वक़्त वे वक़्त की नौकरी भी है और इसकी वज़ह कहीं हद तक यह भी है कि मुझे प्रेरक बहुत ही कम मिले है या यू कहू की प्रेरको की तुलना मे आलोचको से ज्यादा भर गया इस साल मै. हालांकि तकलीफ मुझे किसी से नही है पर प्रेरको की भूमिका हमारे जीवन मे बहुत महत्व रखती है और ऐसा तो है नही कि आप यू-ट्यूब फेसबुक पर देखकर ही सब कुछ सीख लो कही न कही जरूरत महसूस होती है अच्छे मार्गदर्शक की जो आपको समझ सके राह दिखा सके सही गलत बता सके. पर मै इस बात को भी दोष नही दे सकता क्युकी कितने सारे सफल व्यक्ति है जिन्हे सिर्फ तोडने वाले ही मिले पर रास्ते से भटका नही पाया कोई उन्हे. मै  खुद को बहुत परिश्रमी मानता था पर इस महीने के बीतते बीतते पता चल गया कि इसके बिल्कुल विपरित बहुत नालायक हू मै जो ठीक से खुद को भी संभाल नही पाता सपने पूरे करना तो दूर की बात है. सपने संजोना आसान है परन्तु वास्तविकता मे ढाल पाना बहुतई मुश्किल भी है. जो इस बरस नही कर पाया. एक दोस्त की बात याद आती है कि तुमसे ना हो पायेगा. पर मन कहता है कि क्यू नही हो पायेगा. जब मन एकाग्र होता है तो कुछ ऐसा भी कर देता है कि बाद मे विश्वास नही होता खुद से किया है यह चुनौतिपूर्ण काम. पर उसी पर कुछ दोस्त तंज भी कसते है जिनसे मुझे छटांक भर फर्क नही पडता. हा पर ये बात तो है कि मेरा नजरिया सकारात्मक ज्यादा है और पीछे नही हटता मै किसी भी चुनौती से. आदत ही नही है ऐसी. इस साल के पहले दिन से आज के दिन तक एक भी दिन या रात एसा नही गया कि मै अपने गोल को छूकर नही लौटा. जो मुझमे इस बात की तसल्ली देता है कि आलसी तो हू पर भूलने वाला नही और जो भूलता नही वह सपनो को वास्तविक रूप जरूर देता है. माना कि आसान नही है पर इस जहां मे असम्भव भी कुछ नही है. जब सब कर सकते है तो हम भी कर सकते है. पूरा एक वर्ष करते करते बीस से तीस प्रतिशत तक बमुश्किल जोड तोड कर पहुंच रहा हू अगर हिसाब लगाऊ तो. पर एक दिन सौ तक भी यह आंकडा हम ही पहुचायेंगे. देर से ही सही थोडा वक्त और लगेगा पर... कर लेंगे. कोशिश रहेगी आलस छोड दिया तो अगले साल के अंत से पहले तक कुछ नया करने की. जिसकी अभी कठोर तपस्या के माफिक मेहनत करनी पडेगी. अब बदलाव के लिए यह तो पहला कदम है ही. बिना दौड़ तो शेर को भी खाना नही मिलता.
हा पर एक बात है कि इस वरष किताबे पढने का शौक जरूर खूब पूरा किया है मैने और अब तक चल रहा है. कुछ बेहतरीन उपन्यास कुछ बेहतरीन छोटी कहानियां पढते पढते तो जैसे हिन्द युग्म का तो प्रशंसक बन गया हू.

#दिल_जयपुरी

रत्तीभर सुकून

हरजाई जहां समां पराया सा
फिर भी मैं मौन की तलाश में हूं
इस बिलबिलाती दुनिया में
मै रत्तीभर सुकून की तलाश मे हूं

हिम से हिन्द तक शान्त की तलाश मे हूं
जलते घर बिखरते लोगो के बीच
नफरत से पार प्यार की तलाश में हूं
मै रत्तीभर सुकून की तलाश मे हूं

सामने की घृणा से पीछे की मुस्कान तक
उस छिपे रश्क की तलाश मे हूं
तेरे मेरे मेरे तेरे से हमारे तक के
कुछ  मीठे बोल की तलाश मे हूं

हा इस बिलबिलाती दुनिया में
मै रत्तीभर सुकून की तलाश मे हूं

#दिल_जयपुरी #मोहब्बत #एफोर_की_खाली_शीट
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इंतजार और बेरुखी

दशकभर का इंतजार और फिर उसका खत आया,  एक अरसे बाद आवाज सुनी और मैं सन्नाटे सा कंपाया।  फिर वाणीरस बरसा और मैं जैसे धोरों पर बादल इठलाया,  नाउ...