गुरुवार, 27 मई 2021

डॉक्टर.....



 जो अजीब से लिबास मे है 

वह शख्स,

जिसने बचाये है

अनगिनत बिखरने को उतारू सपने


वह शख्स,

घर तो जाता है मगर

नही चूम सकता अपनी बेटी का माथा

कुछ देर, बीबी से दूर रहकर बात करता है

और फिर लौट जाता है अपना कर्त्तव्य निभाने


वह शख्स, 

एक अरसे से, अपनी मां से नही मिला


उसे नही पता होता

किस का क्या नाम है, किस के सर टोपी है या

किस के माथे पर तिलक है

और उसे नही पता होता कि

एक जिंदगी से चलने वाली 

कितनी जिंदगीयां बचाता है रोज


वह शख्स

जो अजीब से लिबास मे है.

जिसने बचाये है

अनगिनत बिखरने को उतारू सपने

शनिवार, 22 मई 2021

श्मशान है, उधर...


 







श्मशान है, उधर से ना गुजरो


तुम्हारी निगाहें इंतजार देख ना पायेंगी

ना ही देख पायेगी कतार से जलते शव...

तुम्हारे गुजरने से लम्बा लगेगा इंतजार

लाशों को अपने दाग का...


और.... 

और कही तुम ठहर गये

तो तुम्हारे पैर टिक नही पायेंगे जमीं पर

यह देखकर कि साथ मे विरासत से कुछ नहीं है

कतार मे काठियां ही काठियां है...


ना ही तुम्हारा मन इतना कठोर होगा

देख पाये कि सिस्टम ने भरोठे मे लाशें भेजी है


ऐसा ना हो कही भीग जाओ अपने ही पसीने में 

सिहर जाओ सोचकर कि क्या चुन लिया 

कही गलतियां याद आ जाये 

और खुद को माफ ना कर पाओ


श्मशान है, उधर से ना गुजरो


काठियां - सजी धजी लाशे

भरोठे - गठरियाँ 

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