#ashtag_तुम्हारे_बाद
कॉफ़ी का चौथा कप भी बिना धोये टेबल के नीचे सरका दिया (कप का तल डूबा रहे इतनी कॉफ़ी कप मे छोड़ने की आदत है) और सिगरेट के न जाने कितने कश लगा चुका हू इस बात से वाकिफ़ होते हुये भी कि यह कितनी नुकसानदेय है । जब अपनी सारी उम्मीदे और जीने की मुराद छोड़ देते है तो कोई फ़र्क नही पड़ता कि क्या गलत है और क्या सही, एसा महसूस होता है । बाहर अधूरा चाँद है पर रात पूरी चाँदनी और आँखो को नींद की वाट तक नही ।
तुम्हारे नाक पे चिउँटी काटने की आदत कितने लोगो को बता चुका हू । उस दिन तुमने बॉल फ़ेक कर मारी थी मुझे और पीछे गमला टूट गया था , याद है ! आजकल वह छत पर पड़ा है । टूटा गमला । टूटी हुई हर चीज एेसे ही मौसम की मार झेलती हुई बेजान सी पड़ी रहती है । हर बसंत बिना शिकायत के सह लेती है और हर बसंत टूटी हुई हर चीज मे जान डालने की असफ़ल कोशिश करता है । बिखरे हुये को समेट कर जान डाल भी दो तो भी वह पहले जैसा नही रह जाता । कम से कम जुड़ने वाली जगह पर सलवट तो रहेगी ही। जैसे टूटे धागे मे जोड़ने के बाद की गाँठ । जैसे रफ़ू किये कपड़े पर उभरते पतले धागे का गुच्छा । जैसे तुम्हारे लौट आने के बाद भी दिल मे उन बेतरतीव बातो की इक टीस या जैसे तुम्हारी एक इंच लम्बी मुस्कान को दो भागो मे बाँट देने वाला वो क्षणिकभर पल ।
कॉफ़ी का चौथा कप भी बिना धोये टेबल के नीचे सरका दिया (कप का तल डूबा रहे इतनी कॉफ़ी कप मे छोड़ने की आदत है) और सिगरेट के न जाने कितने कश लगा चुका हू इस बात से वाकिफ़ होते हुये भी कि यह कितनी नुकसानदेय है । जब अपनी सारी उम्मीदे और जीने की मुराद छोड़ देते है तो कोई फ़र्क नही पड़ता कि क्या गलत है और क्या सही, एसा महसूस होता है । बाहर अधूरा चाँद है पर रात पूरी चाँदनी और आँखो को नींद की वाट तक नही ।
तुम्हारे नाक पे चिउँटी काटने की आदत कितने लोगो को बता चुका हू । उस दिन तुमने बॉल फ़ेक कर मारी थी मुझे और पीछे गमला टूट गया था , याद है ! आजकल वह छत पर पड़ा है । टूटा गमला । टूटी हुई हर चीज एेसे ही मौसम की मार झेलती हुई बेजान सी पड़ी रहती है । हर बसंत बिना शिकायत के सह लेती है और हर बसंत टूटी हुई हर चीज मे जान डालने की असफ़ल कोशिश करता है । बिखरे हुये को समेट कर जान डाल भी दो तो भी वह पहले जैसा नही रह जाता । कम से कम जुड़ने वाली जगह पर सलवट तो रहेगी ही। जैसे टूटे धागे मे जोड़ने के बाद की गाँठ । जैसे रफ़ू किये कपड़े पर उभरते पतले धागे का गुच्छा । जैसे तुम्हारे लौट आने के बाद भी दिल मे उन बेतरतीव बातो की इक टीस या जैसे तुम्हारी एक इंच लम्बी मुस्कान को दो भागो मे बाँट देने वाला वो क्षणिकभर पल ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें