गुरुवार, 11 जून 2020

इक तरफ़ा इश्क

#इकतरफ़ा_प्रेम_का_अधूरा रहना कोई बड़ी बात नहीं बल्कि आम बात है. न जाने कितने प्रेमियों को उनका प्यार नहीं मिलता, ना जाने कितने प्रेमी अपने प्यार का इजहार तक नहीं कर पाते, न जाने कितनों का प्यार समाज की बंदिशों की बली भी चढ़ जाता है. प्रेम दुनिया के सबसे खूबसूरत अह्सासो मे सबसे उपर का दर्जा पाने का हकदार हमेशा रहा है. इस संसार मे कालांतर से कितना भी दृढ़ व्यक्ती प्रेम के जाल से बच नहीं पाया है. जाल नहीं कह सकते हम इसे, इक प्यार भरा बंधन जिसमें इंसान लाख मुश्किलों के बाबजूद पड़े रहना चाहता है, कह सकते हैं. प्रेम मे पड़ने के बाद इक एसा व्यक्तित्व जन्म लेता है जिसकी वह खुद कल्पना तक नहीं कर पाता कभी कभी.
अगर मैं पहले इजहार कर चुका होता तो आज एहसास है वह कभी पैदा ही नहीं होता या कहू कि प्यार अंदर ही अंदर छुपन छुपाई खेल रहा था बड़े दिनों से और अब जाकर यह बाहर आ पाया है. पर पहले कभी मै भी समझ ही नही पाया. अब खुलासा सा हुआ है कि इश्क के अस्पताल मे तू भी घायल पडा है. इक मूर्छित अवस्था की भांति. जिसमें कोई सुद नहीं है खुद की. प्रेम मे पड़े व्यक्ती की हालत कुछ अलग ही होती है जैसे न खा पाता ठीक से ना बात करता किसी से न कुछ और करने का मन करता.  बस हमेशा चुप चाप अजीब से ख्यालो मे पड़े रहना आम बात है.
वन साइड लवर्स की हालत अलग लेवल की पीड़ादायक होती है. ये ना किसी से कुछ कह पाते है ना अपने प्यार का इजहार कर पाते हैं. इनको डर होता है कि कहीं सामने वाले को गलत लग गया तो जो आज की दोस्ती है कही उससे हाथ ना धोना पड़ जाए और बेस्ट फ्रेंड्स वाला प्यार भी खत्म हो जाएगा. जिसकी इस दुनिया मे कोई कीमत नहीं है. बेशकीमती होती है एसी दोस्ती. जैसे कि मैंने इससे पहले वालीं पोस्ट मे भी कहा था कि इकतरफ़ा इश्क को परिभाषित कर पाना मुश्किल होता है. करना भी नहीं चाहिए. जिंदगी में इस तरह का अनुभव एक भिन्नता लाता है जीने के तरीके मे. कुछ लोगो की ताउम्र इसी मे बीत जाती है, कुछ किस्मत के धनी होते है जिनका ऐन वक्त पर मिलाप हो जाता है, कुछ होते है जो सम्भाल नही पाते खुद को और गलत रास्तो की तरफ मुड जाते है. आंखे भीग आना... बात बेबात चिडचिडाना... रास्ते भूलना... जैसी हरकते भी जन्म ले लेती है इंसान मे.
मेरा मानना है कि अगर हम किसी से प्रेम करते है तो हमारे अंदर उसे पवित्र प्रेम से परिभाषित कर सकने का धैर्य और नियंत्रण होना चाहिए. किस्मत होती है कि वह हमारे प्रेम को समझ पाये और हमारी भावनाओ के साथ जुड जाये... पर यह अलग बात हो जाती है फिर. इकतरफा हो या दोतरफा... मुहब्बत दर्द तो देती है. ये मीठा दर्द लोगो की जान तक ले लेता है. और हा... प्रेम की इज्जत करना अच्छे व्यक्तित्व की पहचान है.❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
#दिल_जयपुरी
 #रश्क #शाम #ashtag_तुम्हारे_बाद
#इकतरफा_इश्क
और
#अदरक_वाली_चाय

खामोशी

-खुद ही मे व्यस्त रहती हो ..?
-हा अब यही जीवन है...
- हा..पर क्यू...??? 
-पता नही...... !

                       ....और हर बार की तरह फ़िर वो ही खामोशी जिसके बाद सवाल जबाब नही हो पाते. ना मन के बाहर ना ही  मन के अंदर. चुप सा रह जाता है दिमाग भी दिल भी कि आगे क्या कहना है पता नही. पर सुन सके तो धीमी सांसो की आवाज भी दोनो तरफ़ सुकून दे रही होती है.

 कहने सुनने को कुछ रह नही जाता जब इस तरह की सवाल जबाबी हो,  पर यह आम नही लगती है इस छोटे से कन्वरसेशन मे अलग स्तर का अपनापन झलकता है. मोहब्बत मे यह होना लाजिमी है.

चौराहे पर चाय की दुकान के किनारे से कंडम ट्रैफ़िक पोलिस बूथ के बगल मे खडा खडा कई गोल्ड फ़्लैक फ़ूक चुका हू एक छः सौ एम एल की कोक के साथ. चाय जब काम नही करती है उस वक्त कोक और गोल्ड फ़्लैक का डैडली कोम्बिनेशन काम करता है. करीब डेढ़ घंटे से दीवार पे एक पैर लगाये गुजरती दुनिया को देख रहा हू सबको जल्दी है इतने समय मे एक भी एसा नही दिखा जिसने आराम से ओवरटेक किया हो. आंखे इस तरह ही लोगो को देखना परखना चाहती है कभी कभी. पूरी भावना और मान के साथ प्रेम करना सबके बस की बात नही है.

इंसान के अंदर एक और चीज होती है बदलाव ... जो कि जरुरी होता है पर मन का बदलना कहा तक सही है. परिस्थितिया बदलती है  उसी के अनुसार इंसान का मन क्यू परिवर्तित हो जाता है हर किसी के लिये. बस यही उधेढबुन मन मे चल रही है. पर जबाब खुद के मन को दे नही पाया हू अभी तक. अक्सर यह होता ही है हम सबके साथ कि हमे हमारे ही सवालो के जबाब नही मिलते है और कुछ समय बाद उन सारे सवालो के संतुष्टी वाले जबाब हम खुद ही ढूँढ लेते है एसा भी होता है. मैने उससे कहा था कि एसा कुछ है नही कि मै बदल रहा हू बस समय कि मांग है कि थोडा थोडा हर जगह एडजस्ट करूं पर मुझसे पूरी तरह से या ठीक तरह से हो नही पा रहा है यह सब क्यूंकी मैने हमेशा खुद को हर तरह के  समझौंतो से बाहर रखा है तो असल में मुझे पता नही है कि सवाल जबाब कैसे करते है खुद के साथ जिंदगी के इस वाले चेप्टर मे, पर जल्द ही सब ठीक कर लुंगा यह मेरा विश्वाव है खुद पर. तब तक मुझे मेरा बहुत ही शांत वाला स्वभाव जिन्दा रखना होगा. जो कि मेरे लिये बड़ी बात नही है.

शिकायत है नही कुछ बस यू ही मन मे कुछ भसड होती है तो थोडा बहुत फ़ालतू का लिखना ही सुकूनभरा एक हल है मेरे पास. फ़ालतू की उह पोह मे बबाल वाली मजाल नही कर पाता. क्यूकी मै भी इस जहा से भरपूर प्यार करता हू जिस तरह सब करते है. जिस तरह सब मुझे करते हैं मै भी सबको उतनी ही मुहोब्बत उतनी ही शिद्दत से करता हू. ये एवई वाली बात हो गयी आज तो अगली बार थोडा ढंग का लिखने की कोशिश रहेगी.

#दिल_जयपुरी #मोहब्बत #कोक_लवर😉
(Note:- लेखक किसी भी प्रकार के पेय पदार्थ तथा धूम्रपान  का सेवन नही करता और  ना ही सेवन करने के लिए प्रेरित करता है 😊😊)

दीवार के उस पार 2

सुबह के साढे सात बजे है मै नसीर चाचा की चाय की दुकान पे बैठा हू तभी #दीवार_के_उस_पार कब्रिस्तान की हलचल मेरा ध्यान खींचती है. एक कब्र को गुलाब के लाल फ़ूलो से सजाया गया है. उस पर सिर्फ़ लाल रंग के फ़ूल है. अगरबत्ती जलाई गयी है उसके दो तरफ़ बहुत मात्रा मे इतनी की धुआ थोडा सड़क तक भी आ पहुच रहा है दो बड़े पैकेट कम स कम होंगे. उसके आजू बाजू मे खड़े लोग झक्क सफ़ेद कुर्ता और पजामा पहने है. सफ़ेद टोपी भी . एक व्यक्ति ने टोपी की जगह रूमाल बांध रखा है सर पर.  कब्र की मिट्टी देखकर लग रहा है कि कब्र नयी नही है उसे साफ़ करके अगल  बगल से मिट्टी से ढका गया है और बिल्कुल ठीक आकार दिया गया है एक नयी कब्र की तरह.  क्यूकी मिट्टी का रंग काला है और नयी मिट्टी लाल दिखती है जाहिर सी बात है. इतना तो समझ आ गया कि पुरानी कब्र पर फ़ूल चढ़ाने आये है सब जिनमे एक छोटा बच्चा भी है 8-9 साल का. मन मे सवाल उठ रहे थे कई कि जैसे  हमारे यहा जब पौन महीना होता है तो एक बार फ़िर से स्वर्ग सिधारे जन को याद किया जाता है या फ़िर हर साल पितृ पूजन किया जाता है पित्तरो को याद किया जाता है या वरष मे पुण्यतिथि पर याद किया जाता है उसी प्रकार इनका भी कुछ है क्या इस तरह का रिवाज. चूंकी नसीर चाचा उम्रदराज है तो उनसे अक्सर इस तरह के सवाल, जिनके जबाब हमे सिर्फ़ अनुभवी और जिन्दगी को ज्यादा करीब से जानने वालो से मिल सकते है, मै करता रहता हू. तो मुझसे रहा नही गया और मैने उनको पूछ लिया कि वहा क्या हो रहा है क्या किसी की पुण्यतिथि है ?  उनका एक ही जबाब मेरी सारी जिज्ञासाओ को समाप्त कर देने वाला था. कहा की नही एसा कुछ नही है जिस तरह  तुम करते हो. वह अच्छी तरह जानता है कि अलग अलग धर्मो के अलग अलग रीत रिवाज होते है तो कहा कि जिस तरह तुम हर वरष पुण्यतिथि पर याद करते हो हम लोगो का एसा कुछ है नही, कभी भी हम लोग यह कर लेते है. घर मे सब घर पर होते है या महज एक सामान्य कार्यक्रम  की तरह ही इसे करते हैं किसी भी एक  दिन कि अगले महीने को फ़ला तारीख को चादर चढ़ायेन्गे या फ़ूल बगैरा चढ़ाकर याद किया जायेगा उस दिन के लिये सब करीबीयो  सूचित कर दिया जाता है बस. चाहे तो घर पर भोज भी रख लेते है चाहे तो नही भी  रखते है. मुझे और जानने का मन हुआ तो पूछ लिया कि आप लोग भी बाकी तमिल परिवारो की तरह एक दिन या कभी कभी  दो से तीन दिन तक मृत शरीर को घर पर ही रखने का रिवाज है क्या  . उनका जबाब फ़िर से चौकाने वाला था मैने भी पहली बार किसी से इस तरह का सवाल किया था . उन्होने एक कान को हाथ लगाते हुये कहा कि नही एसा नही होता. कुरान मे लिखा है कि अगली नमाज से पहले शरीर को दफ़नाना अनिवार्य है यदी किसी कारणवस या समय कि असन्तुलितता के कारण ना हो सका तो उससे अगली नमाज से पहले दफ़नाना अनिवार्य है. कहने का मतलब तमिल लोगो की तरह  मृत शरीर को रखना बिल्कुल भी संभव नही है. जिस तरह तुम लोग  सूरज ढलने के बाद कोई प्राण त्यागता है तो उसे सूरज निकलने के बाद ही अंतिम संस्कार  किया जाता है उसी तरह हमारे दिन की पांच नमाज के हिसाब से रहता है. और दूसरा बात ये है कि ज्यादातर तमिलीयनो के परिवार से कोई न कोई परदेश मे दिहाड़ी करता है तो ये लोग भी उसी के इंतजार मे इतना लम्बा वक्त इंतजार को मजबूर हो जाते है सामान्य स्तिथि  मे ये भी जल्द ही सब क्रिया करम खत्म करने की कोशिश करते है.
मुझे आज बहुत ज्ञान मिल चुका है. और मेरी #चाय_का_फ़ेवरेट_कांच_का_गिलास से चाय खत्म हो गयी है. 
#Keep_पढना
😊
#दिल_जयपुरी  #दीवार_के_उस_पार #कब्रिस्तान_के_ठीक_सामने #जिन्दगी_के_फ़लसफ़े

बुधवार, 29 जनवरी 2020

जर्नी

#जर्नी

जन शताब्दी मे ईत्ती भीड़ मैने कभी ना देखी .
भाईसाब पैरो ने मना कर दिया फ़रीदाबाद आते आते तो कि हम खड़े ना रह रहे अब , थक चुके है पूरी तरह.  तार तार हो चुकी है जाँघ और पींढी की सब नसें . बड़ी माथापच्ची के बाद निजामुद्दीन तक खड़े रहने को राजी हुई. तारा भाई बोल रहे है निजामुद्दीन पर Metro नही है बस से आना पड़ेगा मखै ना .  अपुन को Metro मालिश मान्गता है आज . बाहर चेक किया तो गेट के बाहर Metro , यार आप अब झूट भी बोलते हो.

Metro Station पर फ़र्श पर बने ये येलो/मैजेंटा कलर के पग आपको एैसे ले जाते कि अगर आपने इनसे पैर हटा लिया तो दिल्ली Metro की गारंटी नही है कि Destination पर तुम पहुच ही जाओ.  अपनी रिस्क है तुम्हारी.  मै ये ही सोचकर पग पे पग रखकर चल रहा था लोग मुझे देख रहे थे कि बंदा लगा के आया है या... 😜.   इत्ते मे  येलो पग की कतार के बीच मे  डिवाईडर आ गया. 

- मखै हटाओ इसको मै खो गया तो. 
सिक्यूरिटी वाला बोला -
सर आप इधर से आ जाओ .
-अबे जब उधर से जाना था तो ये पग बिना घुन्घरू के इधर से क्यू निकाले उधर से ही निकालते ना. 
बोला -
सर केजरीवाल की गलती नही है  कांग्रेस थी  सत्तर साल से. 
मखै -
तुम भेन्चो अब  ये  लाईन लाईन  खेलने  केजरिवाल को बुलाओगे. अच्छा खासा चल रहा है उसका मेमे मार्केट उसे परेशान क्यू करना.
ठीक है उधर होकर निकल लुंगा मै तो पर ये ठीक बात नहीं है भाईसाब.
पैसेंजर को तो उल्टा गुमराह ये एक हाथ चौड़े पग कर रहे है. और एक बात बताओ. ये इतने  चौड़े पैर किसके होते है भई. आम इंसानो के तो होते नही.  राहुल गांधी का पता नहीं. 
- सर राहुल गांधी भी आम आदमी ही है.
- यार  तुम फ़िर केजरिवाल को बीच मे ला रहे हो.
-सर वो तो आप लेकर आये थे. 
-चल छोड़ अब तू ये छ महीने से कार्ड यूज नही किया चलेगा.
-सर दौड़ेगा आप की ही सरकार है.
-साले फ़िर तू केजरिवाल को घसीट रहा है तुझसे तो मुह लगना ही बेकार है.
जैसे तैसे T3 आ गया मै. इधर बाहर निकलते टाइम लेफ़्ट मे दिख गया पिछली बार जिसे टिकट काउन्टर समझा था वो दारु का ठेका निकला था. ठेका तो ठेका ही होता है चाहे सोने की छड़ो के पीछे हो या लोहे के सरीयो के पीछे. गैप हाथ घुसाने और एक बोतल बाहर निकल सकने लायक ही रहेगा.

भाईसाब इतना बडा Airport है कुछ दिन पहले अखबार मे पढा था कि दुनिया के पांच सबसे व्यस्त Airport मे है. ये ध्यान आते ही फ़ीलीन्ग अमीरपणा . इत्ते मे पापा का कॉल आ गया.
- पैसे डाल देना कतई चाय पीवे कू भी नही है.
अकाउंट चेक किया  चार सौ पचपन थे भाईसाब. मखै -
पापा मै नही खेल रहा यार. कल तनखा आयेगी तब देखते हैं.  सडनली फ़ीलीन्ग दुनिया का सबसे बडा गरीब. मन किया यही कटोरा लेके बैठ जाऊ.
 अंदर आने के लिये गेट मे घुसने लगा तो सिक्युरिटी वाला बोला -
 लाला Pass वाले निकलै यामे होके.  तू पीछै वाली लाईन मे लग के निकल.
- कतई जाट लग रहा था हरियाणा का मखै यही मारेगा कै भई.

मिडिल क्लास वालो की ये ही प्रोब्लम  है. पढ़ा भी नही जो लिख रहा था. जैसे तैसे अंदर आ गया. चेक ईन तो नयी दिल्ली करा ली इस बार.   वही दे दिया कोथडा अपना.  इधर सीधे अंदर ही घुसना है.
इस बार गेट सिक्युरिटी चेकिन्ग पर पूरा लिखा हुआ पढ़ा फ़िर एक ट्रे लेके सामान रखा उसमे. दो फोन,  पावर बैंक, डाटा केवल, बेल्ट,  पर्स फ़िर सरका दिया एक बोल रहा था -
भाईसाब आपमे ज्यादा वजन है या इनमे. 
मैने कहा
-भाई तेको क्या लगता है.
इतने मे मच्छर मारने के रैकेट को इधर उधर घुमा के SI बोला कि -
Level U ना रखी लाला ट्रे मे, 
-उरे...  तभी मै सोचू ट्रे मे जगह खाली कैसे रह गयी थोड़ी सी .  पहले जो वजन की पूछ रहा था वो देखकर मुस्कुराया कि लाला का बस ना चला वरना गोज्या मे ही कम्पोटर धर के लाता ये पक्का.
यहा आके लग रहा था देश बडा खूबसूरत है अपना. हर तरफ़ आग लगी पड़ी है भाईसाब. पर अमीर लोगो मे गरीबी देखनी हो तो या तो CP या airport आओ. विभिन्न प्रकार की गरीबी देखने को मिलेगी.
सीट तो window है पर बीच की चार सीट आर पार खाली है.  उधर लास्ट मे ताऊ बैठे है. इतनी सिन्गलता तो गान्धी की जिन्दगी मे भी ना थी जितनी मेरी मे है आजकल . उपर से एयर होस्टेज  Male है आज. रात मे Male एयर होस्टेज  का मतलब समझते हो ?. मतलब कुछ नही है मुझे अपनी किस्मत पर भरोसा है.  देखने का सुख भी ना देती मुझे तो कि जी भर के देख लिया तो अनर्थ हो जायेगा मानो. जबकी किस्मत को खूब पता है कि हाथ में कोई दोष नही है मेरे मे. आंखों को मै कंट्रोल मे रखता हु फ़िर भी.
" कृपया बैठे हुये कुर्सी की पेटी बांधे रखिये " मै ढूँढ रहा हू पर मिल नही रही है. इतने मे वो ही Male आया  और बोला सर सीट बेल्ट लगा लो प्लीज.  पेटी क्यू बोलते हो सालो हमे सूट ना करते ये वर्ड.  हमे बेल्ट ही चाहिए.
और ये लिखते लिखते चेन्नई आ गया भाईसाब.  मखै मात्र तीन हजार खर्च करके  तीस घंटे बचा लिये लाला. पर अभी चार सौ और देने है रात को लोकल ना मिलेगी घर तक. पैसा डॉलर के बराबर होता तो मै सिक्को मे खेलता भेन्चो एक एक रुपया के मे .😂😂

#दिल_जयपुरी
#दिल_का

जब महसूस होता है कि तुम्हारा किसी के प्रति बहुत सारा प्यार उसके द्वारा छोटे छोटे हिस्सों मे बाटां जा रहा है या फ़िर जो मोहब्बत पहले थी, पहले मतलब अभी कुछ कल शाम तक , उसके बिखरने जैसा लगता है तो तुम सबकुछ सम्भालना चाहोगे कि कुछ भी तितर बितर ना हो. वरना मोहब्बत, प्यार , अपनापन एक एसी चीज है कि समेट पाना मुश्किल होता है हो सकता है ताउम्र समेट भी ना पाओ. मैने कभी नहीं सोचा कि इस तरह का बदलाव एक ही शाम मे आयेगा.  आज लग रहा है कि या तो मै गलत हू या वो क्यूकी एक तो गलत होता ही है हमेशा , या फिर , हो सकता है नासमझ हो उसकी.  जो भी है खोना मुझे नही आता क्यूकी हर इंसान को मोहब्बत देना मेरे वश की बात नही है लेकिन जिसको की है उसे दूर कर देने की ताकत भी मुझमे नही है चाहे पहल मे वो जो भी करे मुझे अपनो के वार सहने की आदत है . किसी न किसी रूप मे सहता आ रहा हू लम्बे समय से.

बदलाव मतलब कल तक जो जिद करे किसी बात पे आज अचानक से सहमत हो जाये ये तो आसान नहीं था उसके लिये फ़िर क्यू.  सीधा सा हिसाव है मन में कुछ तो बैठ गया है या तो मेरा मजाक या हालातो की समझ हो गयी है.  दोनो मे से जो भी है मुझे पसंद नही.  जिस तरह दिमाग मे बैठी नकारात्मकता अच्छी नही लगती ठीक उसी प्रकार मै ये भी कबूल नही पाउन्गा कि वो जिद्दीपना छोड़कर  इनोसेन्ट बन जाये. क्यूकी मुझे उसी मे पसंद है वो.  मुझे वही अवतार पसंद है उसका.  मुझे वही बचपना पसंद है उसमे.  मुझे वही बात बात पे लड़ना पसंद है.  एसे होते है हमारे जीवन मे बहुत सारे अपने जिनका अच्छा बन जाना हमे अच्छा नही लगता बिल्कुल वैसे ही जैसे अच्छे लोगो का बुरा बन जाना पसंद नही आता.

किसी जमीन की प्रकृति को दो भागो से समझ सकते है . एक थोडा उँचा वाला भाग जहा पानी रुक नही पाता और नीचा भाग जहा जाकर भर जाता है.  एक ही जमीन पर  एक ही प्रकार के बीजो मे जब आधे बीज नीचे बहकर चले जाते है इस तलाश मे कि पानी ज्यादा मिलेगा शायद तो वो सुखी रहेंगे या खुश रहेंगे. ये जमीन के दो भागो की ही तरह बंट जाते है.  उँचाई पर उगे पौधे हष्ट पुष्ट रहते और नीचे वाले रहते तो ज्यादा पानी मे है पर उपर अच्छी सेहत दिखती है जबकी नीचे सड़ जाते है ज्यादा पानी की वजह से जिसे वो किसी से बयां भी नही कर पाते क्यूकी बाकी से अलग हुये थे. ठीक इसी प्रकार उन्चाई वाले अच्छे लोग अपने हो जाते है और नीचे वाले बुरे अपने हो जाते है जिन्होने खुद रास्ता चुना होता है जिनको शायद अपना कहना भी गलत लगता है एक दिन .

मै अपनी जिन्दगी मे किसी अपने को इतनी आसानी से नीचे बहकर नही जाने देता. रोक लेना अच्छी बात है क्यूकी फ़िर जुड़ पाना भी सम्भव नही हो पाता है कभी कभी. जुड़े रहने की कोशिश करनी चाहिए . उसके लिये कुछ गवाना पड़े तो फ़र्क नही पड़ता. हम वस्तुये गवा सकते है वापस मिल जाती है पर अपनापन गवा दिया तो वापिस नही मिल पाता. मिल भी जाता है तो उस स्तर का कभी नही मिल पाता जिस स्तर का खोने से पहले होता है .

#दिल_जयपुरी

सपनो के सौदागर

बात 2008 की है मैं जब 9th मे था. एसे ही एक दिन लंच मे घर से खाना खाकर आए हम. घर के पास ही स्कूल हुआ करता था तो घर ही खाने आ जाते थे टिफिन साथ मे लेकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. वापस आते टाईम हम कई दोस्त साथ मे आ रहे थे. मैं और एक दोस्त थोड़े से पीछे रह गए क्युकी हम धीरे धीरे चल रहे थे बाकी से तो पता नहीं क्यु एसे ही मेरे मन मे कुछ आया और मैं दोस्त से बोला कि यार ऐक्टर बनने के लिए क्या ज़रूरी है मतलब कोई अभिनेता बनना चाहे तो उसके पास क्या होना मायने रखता है. उस वक़्त इतनी समझ हममे नहीं हुआ करती थी बस इतना ही थी स्कूल से घर घर से स्कूल यही जिंदगी हैं और फ्री टाईम मे घर मम्मी-पापा से छुपा के दोस्तों के साथ खेलना क्युकि किसी भी पैरेंट्स को बच्चों का खेलना बिल्कुल पसंद नहीं होता था गाव में क्युकी उनका मानना था कि ये बस पढ़े लिखे अच्छे आदमी बने यू खेलने के पीछे कहीं किताबों से मन ना भटक जाए. तो वो दोस्त बोला कि देख ऐक्टर बनने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि पैसा हो आदमी के पास और दूसरा सबसे जरूरी है बॉलीवुड मे दो चार पक्के मित्र या रिश्तेदार हो जो काम दे दे फिल्म बगैरा मिल सके और तीसरी जो है वो ये बात है कि उसपर ऐक्टिंग आनी चाहिए. मुझे ये पता नहीं था कि मैं क्यू पूछ रहा हू बस एसे ही पूछ लिया कि ये लोग कैसे वहा तक पहुचते होंगे बिल्कुल एक एसे सवाल की तरह जिसका बस जवाब जानना होता है जैसे हिन्दी के टीचर को इस बात से मतलब नहीं है कि याद समझ के किया या रटंत विद्या चलाई है. जवाब मुझे मिल गया था पर मन ये फिर इसी जवाब से एक और सवाल पैदा हो गया कि इसने ऐक्टिंग को तीसरे नंबर पर क्यू रखा. खैर उस उमर मे इतना जवाब मिल गया काफी था पर मैं इस पैदा हुए सवाल को आज तक नहीं भूला शायद ये बात मुझे इसी सवाल की वज़ह से याद है.
अब जब सिल्वर स्क्रीन पर पंकज त्रिपाठी नवाज भाई जैसे अभिनेता दिखते है जिन्होंने खानदानी अभिनेताओं की वाट लगा रखी है तो समझ आता है कि ना पैसा चाहिए ना रिश्तेदार जो काम दिला सके सिर्फ टैलेंट चाहिए. काम तुम्हारे पास खुद चलकर आयेगा. दूसरा बात ये भी कि जो करना है ना, वो कर डालो. चाहो जो भी करना हो.  पैसा काम दिला दे जरूरी नहीं है पर मेहनत का वक़्त जरूर आता है.

#दिल_जयपुरी

सपनो की बली

जिस उम्र मे एक व्यक्ति सपने देख और समझ सकता है, सम्पूर्ण उर्जा के साथ पूरा करने का प्रयत्न कर सकता है, लीक से हटकर करना चाहता है, उम्र का वह हिस्सा पढ़ाई और रोजगार की तलाश मे खत्म हो जाता है. मानता हूं पढ़ाई जरुरी है रोजगार भी जरुरी है. पर आपको ये भी मानना पड़ेगा कि सपने दबाना मतलब खुद के साथ ही कही न कही नाइंसाफ़ी है . एक युवा का सिर्फ़ सरकारी या प्राइवेट नौकरी करना ही सपना नही हो सकता. जिनका होता है उनका जीवन बीत जाता है बस पर कुछ कम मात्रा मे ही एसे होते है.  ज्यादातर लोग कुछ करना चाहते है जीवन मे जिससे उनके मन को संतुष्ट कर सके वो.  हर सरकारी नौकर ने ख्वाहिशे दाव पर लगाई है मजबूरियो को गिनकर या फ़िर वो ख्वाहिशो को जिन्दा रखना नही जानते. रोजगार के बाद सब कम्फ़र्ट जोन मे चले जाते है और ये एक एसा जोन है जिसमे जाने के बाद सिर्फ़ वो ही बाहर आ सकता है जिनको जिन्दगी से किक चाहिये. जो सोचते हैं बहुत खेल लिया जिन्दगी ने हमसे चलो अब हम जिन्दगी से खेलते है. अक्सर एसे लोगो को मंदबुद्धि कहते है. बाद मे पता चलता है कि उस बंदे ने कुछ एसा कर दिखाया कि हम सोच भी नही सकते. अपनी उर्जा की शक्ति पहचाना बड़ी बात है.  उससे बड़ी बात है उस पर रिस्क लेना . जो ले लेता है वो जीत जाता है या हार भी जाता है ये अलग बात है पर उसके लिये हिम्मत दिखाना बड़ी बात है. हर कोई रिस्क लेने से डर जाता है इसीलिये कम्फ़र्ट जोन से बाहर कोई नही आता. क्यूकी उससे बाहर हमेशा रिस्क है. लाईफ़ मे कुछ होगा या नही होगा ? जोब तो जिंदगीभर रहेगी पर सिर्फ़ गिटार बजाने मे फ़्यूचर कहा है? या फ़िर बिजनेस की सोचने वालो के दिमाग मे आता है चलेगा या नही ? बगैरा...

परंतु...  ये भी सच है कि....
जिसको  बिजनेस खडा करना है वो वो ही करके रहता है चाहे कुछ भी उसे करना पड़े उसके लिये,  जिसको राजनिति मे जाना है वो जरुर जाता है कितनो ने अच्छी खासी सरकरी नौकरी छोड़ दी इसके लिये, जिसको समाज सेवा करनी है वो जरुर करता है बिना किसी भेदभाव और मतलब के,  जिसको V Prodection की तरह सपने देखना है वो सपने देखता भी है पूरा भी करता है और एसे लोगो को ना तो कोई रोक पाता है ना ही ये अपने आरामदायक जीवन की कल्पना करते, ना ही सोसाईटी की बातो से फ़र्क पड़ता है और ना ही रिस्क लेने से डरते है. अंत मे विजयी सफ़लतम व्यक्तियो मे गिनते है फ़िर एसे लोगो को वो जिन्होने अपने कम्फ़र्ट जोन वाला कमरा नही छोड़ा कभी असफ़ल होने के डर और रिस्क नही लेने की कमजोरी से.

कहने का मतलब आज भी वो ही है जो कल था कि जो करना है ना, वो कर लीजीये वरना साँसे तो कम होती ही जा रही है एक दिन खत्म भी हो जायेंगी. कम स कम मलाल तो नही रहेगा. जीवन मे आत्मसंतुष्टी बहुत ज्यादा गहराई वाली बात हो जाती है जो कम लोगो को ही मिलती है.

#दिल_जयपुरी

इंतजार और बेरुखी

दशकभर का इंतजार और फिर उसका खत आया,  एक अरसे बाद आवाज सुनी और मैं सन्नाटे सा कंपाया।  फिर वाणीरस बरसा और मैं जैसे धोरों पर बादल इठलाया,  नाउ...