सुबह के साढे सात बजे है मै नसीर चाचा की चाय की दुकान पे बैठा हू तभी #दीवार_के_उस_पार कब्रिस्तान की हलचल मेरा ध्यान खींचती है. एक कब्र को गुलाब के लाल फ़ूलो से सजाया गया है. उस पर सिर्फ़ लाल रंग के फ़ूल है. अगरबत्ती जलाई गयी है उसके दो तरफ़ बहुत मात्रा मे इतनी की धुआ थोडा सड़क तक भी आ पहुच रहा है दो बड़े पैकेट कम स कम होंगे. उसके आजू बाजू मे खड़े लोग झक्क सफ़ेद कुर्ता और पजामा पहने है. सफ़ेद टोपी भी . एक व्यक्ति ने टोपी की जगह रूमाल बांध रखा है सर पर. कब्र की मिट्टी देखकर लग रहा है कि कब्र नयी नही है उसे साफ़ करके अगल बगल से मिट्टी से ढका गया है और बिल्कुल ठीक आकार दिया गया है एक नयी कब्र की तरह. क्यूकी मिट्टी का रंग काला है और नयी मिट्टी लाल दिखती है जाहिर सी बात है. इतना तो समझ आ गया कि पुरानी कब्र पर फ़ूल चढ़ाने आये है सब जिनमे एक छोटा बच्चा भी है 8-9 साल का. मन मे सवाल उठ रहे थे कई कि जैसे हमारे यहा जब पौन महीना होता है तो एक बार फ़िर से स्वर्ग सिधारे जन को याद किया जाता है या फ़िर हर साल पितृ पूजन किया जाता है पित्तरो को याद किया जाता है या वरष मे पुण्यतिथि पर याद किया जाता है उसी प्रकार इनका भी कुछ है क्या इस तरह का रिवाज. चूंकी नसीर चाचा उम्रदराज है तो उनसे अक्सर इस तरह के सवाल, जिनके जबाब हमे सिर्फ़ अनुभवी और जिन्दगी को ज्यादा करीब से जानने वालो से मिल सकते है, मै करता रहता हू. तो मुझसे रहा नही गया और मैने उनको पूछ लिया कि वहा क्या हो रहा है क्या किसी की पुण्यतिथि है ? उनका एक ही जबाब मेरी सारी जिज्ञासाओ को समाप्त कर देने वाला था. कहा की नही एसा कुछ नही है जिस तरह तुम करते हो. वह अच्छी तरह जानता है कि अलग अलग धर्मो के अलग अलग रीत रिवाज होते है तो कहा कि जिस तरह तुम हर वरष पुण्यतिथि पर याद करते हो हम लोगो का एसा कुछ है नही, कभी भी हम लोग यह कर लेते है. घर मे सब घर पर होते है या महज एक सामान्य कार्यक्रम की तरह ही इसे करते हैं किसी भी एक दिन कि अगले महीने को फ़ला तारीख को चादर चढ़ायेन्गे या फ़ूल बगैरा चढ़ाकर याद किया जायेगा उस दिन के लिये सब करीबीयो सूचित कर दिया जाता है बस. चाहे तो घर पर भोज भी रख लेते है चाहे तो नही भी रखते है. मुझे और जानने का मन हुआ तो पूछ लिया कि आप लोग भी बाकी तमिल परिवारो की तरह एक दिन या कभी कभी दो से तीन दिन तक मृत शरीर को घर पर ही रखने का रिवाज है क्या . उनका जबाब फ़िर से चौकाने वाला था मैने भी पहली बार किसी से इस तरह का सवाल किया था . उन्होने एक कान को हाथ लगाते हुये कहा कि नही एसा नही होता. कुरान मे लिखा है कि अगली नमाज से पहले शरीर को दफ़नाना अनिवार्य है यदी किसी कारणवस या समय कि असन्तुलितता के कारण ना हो सका तो उससे अगली नमाज से पहले दफ़नाना अनिवार्य है. कहने का मतलब तमिल लोगो की तरह मृत शरीर को रखना बिल्कुल भी संभव नही है. जिस तरह तुम लोग सूरज ढलने के बाद कोई प्राण त्यागता है तो उसे सूरज निकलने के बाद ही अंतिम संस्कार किया जाता है उसी तरह हमारे दिन की पांच नमाज के हिसाब से रहता है. और दूसरा बात ये है कि ज्यादातर तमिलीयनो के परिवार से कोई न कोई परदेश मे दिहाड़ी करता है तो ये लोग भी उसी के इंतजार मे इतना लम्बा वक्त इंतजार को मजबूर हो जाते है सामान्य स्तिथि मे ये भी जल्द ही सब क्रिया करम खत्म करने की कोशिश करते है.
मुझे आज बहुत ज्ञान मिल चुका है. और मेरी #चाय_का_फ़ेवरेट_कांच_का_गिलास से चाय खत्म हो गयी है.
#Keep_पढना
😊
#दिल_जयपुरी #दीवार_के_उस_पार #कब्रिस्तान_के_ठीक_सामने #जिन्दगी_के_फ़लसफ़े
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