रविवार, 1 सितंबर 2019

तुम्हारे बाद A

#ashTag_तुम्हारे_बाद
                        मै हमेशा से ही उसके पास रहना चाहता था ।  मेरा दिल कभी उसे छोड़कर जाने को राजी नही हुआ और ना ही कभी मेरे हाथो ने उसके हाथो को छोड़ना चाहा । नींद मे भी अपने होंठों को उसका नाम बुदबुदाते अक्सर पकड़ा है मैने । उसका नाम कई दफ़ा पुकार लेने की रिश्वत मांगी है मुझसे इन अंधेरी रातो ने नींद भेजने के बहाने ।
                      हर वो सुबह जो इस जहां मे खुदा की ईबादत से शुरू होती है , मेरे लिये उसका जिक्र किये बिना कभी नही हुई । आज भी हर शाम मुझसे शिकायत करती है कि शायद मै अभी तक खुद के लिये नही जी पाया हू । वास्तव मे..??...  पता नहीं!
                       मेरे कमरे के दरीचे से झाँकता ये अशोक का लम्बा पेड़ मेरी पल पल की बेचैनी का गवाह रहा है । इसने मुझे दिन मे उसका नाम चिल्लाते देखा है तो रात को बालकनी मे भटकते भी,  उसकी यादो की वजह से औझल नींद के कारण । पर इसने मेरे हालात समझे है सो चुप रहता है या इसे तरस आता है मेरी हालत पर । पता नहीं क्या है ।

शुक्रवार, 17 मई 2019

मद्रास डायरी 5

मद्रास डायरी 5

ये पांचवा दिन था. आज वो दिखाई नहीं दे रही . मेरी नजरे बस उसी पर टिकना चाह रही थी पर उसकी नामौजूदगी मे टिक नही पा रही थी.  कोच मे कभी इस तरफ़ तो कभी उस तरफ़ देखें जा रहा था बेकार में. धूप भी ठीक से नही खुली आज शायद बारिश आयेगी दोपहर तक. घने काले बादलो से लग रहा था कि मौसम ज्यादा ही खराब होने वाला है .   मन अशांत सा है. अनकहे से कई अरमान दिल मे थे और न जाने कब से जो सब आज उसके साथ शेयर करने वाला था. सब तरफ़ निगाह फ़ेरने के बाद कन्फ़र्म हो गया था कि आज वो नही आयी है.  मेरे डेली रुटीन मे आज उसकी कमी थी . पर उसकी कई साथी आयी है सिर्फ़ वो ही नही एसा क्यू.  मन मे ख्याल आ रहा था शायद खराब मौसम की वजह से नही है पर दूसरा ख्याल कहता तो फ़िर ये सब कैसे आ गयी वैसे भी  मौसम इतना भी खराब नही है.  कही सौ ख्वाव देखे थे सब का कोई अता पता नही . तभी उसकी एक साथी ने आवाज लगायी... 
क्या आप ही रिन्कू हो ??
हा!  पर...!!!
वो अब नही आयेगी. 
पर क्यू? 
उसने दूसरी कम्पनी जोईन कर ली बैंगलोर मे आज से.  शैटरडे को निकल गयी थी वही शिफ़्ट हो गयी है वो अब. 
तो आपको कैसे पता हमारे बारे मे ??
उसने मुझे बता रखा था पहले दिन से ही. 
कल कोल किया था तो बोल रही थी अगर आप मिलो तो एक बार बता दू.

इस छोटे से कन्वरसेशन मे सब खत्म हो गया था. लग रहा था बडा ख्वाव अधूरा रह गया. मन बैचैन पहले से ही था अब तो मानो टूट सा गया.  कुछेक पल की बातो से इतना लगाव. दरअसल लगाव तो पहले ही था बात अब हुई थी. उसकी हर बात रह रह के याद आ रही थी.  उसके पास होने जैसा महसूस तो नहीं हो रहा था पर कुछ तो था जो थोडा लग रहा था कि यही आस पास ही है.

आपका नम्बर दे सकते हो?  उसकी सहेली ने अचानक से कहा. 
आपको??
नही!  वो मांग रही थी. आपसे बात करना चाहती है. शाम को बात करूंगी तब दे दुन्गी. 
ओह. !
हा. उसका घर यही है. पर वहा पैकेज अच्छा मिलने के कारण चली गयी है.  " उसने कहा

 मेरे अंदर की उदासीनता लम्बी मुस्कान मे बदल गयी थी. इतनी सी देर मे पता नही क्या क्या सोच लिया था. किसी को दिल से चाहते है तो वो जरुर मिलता है ये बात शायद सच निकली. हल्की बारिश के साथ मौसम खुशनुमा हो रहा था.  मै उतर कर office आ गया था.

मद्रास डायरी 4

#मद्रास_डायरी 4

शाम के छ: बजे है. थोड़ी तेज अदरक और शक्कर वाली चाय की चुस्की के साथ थडी पे बैठे बैठे सड़क पर आते जाते वाहनो का मुआयना करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा सा है. अक्सर अकेला होता हू. रोज की तरह गुजरती बड़ी छोटी गाडियों की कम्पनियो के नाम पढ़ रहा हू . चाय एकदम बढिया बनाता है अन्ना.  आज ही बोल रहा था इसको कि अन्ना तन्दूरी टी स्टार्ट करो अब ज्यादा कमाई होगी और आसपास है भी नही दूर तक. मैने कभी पीयी नही पर बनने के तरीके से कह सकता हू कि शानदार होगी टी लवर्स के लिये.  तभी एक स्कोडा सामने से निकली और बगल के रिलायन्स फ़्रेश के आगे रूकी.
    ड्राइवर सीट से एक लडकी उतरी. क्रीमी शर्ट और डेनिम के साथ चार इन्च उचे सफ़ेद नाईकी स्नीकर पहने  गालो पे झूलते बालो को कान पे सरकाती हुई खच्च से गेट को लगाया और अंदर जा ही रही थी कि मैने पहचान लिया अरे ये तो वो ही है जो रोज ट्रेन में मिलती है. पर यहा कैसे. दो चार बची घूट जल्दी खत्म कर चाय का गिलास रखा और अन्ना के मुह पे कागज का दस का नोट मारा . मै भी अंदर गया. वह सब्जीया देखने लगी और मै पीछे वाली गैराज से होता हुआ उसी के सामने आ गया भुजिया का बडा पैकेट हाथ मे लिये ताकी उसे मात्र संयोग वाली फ़ीलिन्ग आये.

फ़ीलिन्ग लाईक...
#उनसे_नजरे_क्या_मिली_रोशन_फ़िजाये_हो_गयी

"ओह... आप यहा कैसे ! "मैने पूछा .
"अरे.. आप  ? हा यही थोड़ी दूर ही तो रहते है हम.  पर आप यहा कैसे.? आप तो विल्लीवक्कम रहते हो. "
"हा!  पर हम यहा चाय पीने इसी दुकान पे आता हू  और सामान लेने भी यही  "
"पहले कभी नही दिखे ."
"आज देख लिया ना.  "
" हा पर... " इतने मे लम्बी ट्यून के साथ कुछ लीरिक्स सुनाई दिये

मेरा नाम इश्क ...तेरा नाम इश्क ...
ये #लाल_इश्क ...ये मलाल इश्क ...

मेरा हाथ अपने आप मोबाईल तक गया और अलार्म बंद कर दी.  सुबह के छः बजे थे.
ओ हो... यहा भी #अधुरा_लाल_इश्क

मद्रास डायरी 3

#मद्रास_डायरी 3

                      स्टेशन पर उतरते ही मै सीधे ओफ़िस गया. मन मे वो ही चल रही थी स्वभाविक है इतने दिनो से अपने क्रश को मै सिर्फ़ देखता था और आज अचानक से उसने माहौल एसा बनाया कि मै खुद को बात करने से रौक नही पाया. लड़की एसी ही होती है.  उनको अगर किसी से बात करनी है तो वो खुद माहौल एसा बनाती है कि लड़का अपने आप बात करने लगता है जब दूर रहना चाहती है तो उनके मन मे ख्याल तो क्या सामने खड़े आदमी की शक्ल भी नही दिखेगी कि है कौन सामने. लड़कियो को हर पल मिलने वाले लोग पता नहीं रहते लड़को को हर पल दिखने वाली हर लड़की कितने ही दिनो तक याद रह सकती है .अब इसे प्रकृति का नियम कहो या कुछ और.
                  " केदार,  अदरक वाली चाय लेके आओ सबके लिये ओफ़िस मे.  '  मैने ओफ़िस मे एक कर्मचारी को कहा जिसका काम सिर्फ़ चाय लाना ही है. अक्सर ओफ़िस आते ही चाय के लिये जाता है सो उसके लिये सामान्य था पर मैने तो आज अलग खुशी मे चाय मंगवाई है. पर यहा ये राज ही रहेगा . मेरा मन तो कर रहा है खुशी खुशी मे सोने की अशर्फ़िया बंटवा दे आज तो अपनी नगरी मे . मैने फ़िर अमृत भैया को फ़ोन मिलाया जो अगले दो स्टेशन छोड़ के तीसरे पर duty रहते हैं. 
"गुड मोर्निन्ग भैया "
"मोर्निन्ग तो ठीक है पर ये बता आज आवाज अलग लग रही है.  लोहागढ फ़तेह कर लिया क्या "  मेरी आवाज मे खुशी महसूस करके वोले.
' Duty क्या है "
' जनरल '
' ठीक है आते हैं  लेमन टी पीने चलेन्गे लंच में '
' ठीक है,  पर सब ठीक तो है. '
' हा,  सब ठीक है,  बाकी मिलके बताते है.  और वो मिट्टी का किला फ़तेह करके क्या अचार डालून्गा मै , किरकिरायेगा हम दोनो के मूह मे. मिलके बताते है,  बाय! 
सबको लग तो गया कि बंदा आज खुश हैं. पर वजह सिर्फ़ मुझे ही पता है.
' सर चाय ' केदार चाय ला चुका था पता ही नही चला.
' आज कृष्णा नही आया क्या, दिख नही रहा? '
'नही सर वो उसकी वाईफ़ को होस्पिटल लेके जायेगा'  तीखी मुस्कान के साथ कहा.  क्युकी हम सबको पता है कुछ दिनो मे पिता बनने वाला है वो रूटीन चेकअप के लिये गया होगा. 

करीब  बारह बजे अचानक मुझे कुछ याद आया और सिर झझोड के एक मुक्का जोर से टेबल पे मारा.
"ओ शिट , कट गया आज तो सुबह सुबह. " मेरे मुह से निकला.  सुबह से खुश था पर अचानक से मुह उतर गया.
मैने फ़िर अमृत भैया को फोन लगाया.
"कहा हो भैया "
"स्टेशन,  क्या हुआ... आवाज मे फ़र्क है. "
"बोला तो था आके बताता हू "
"अरे पर... " मैने फोन काट दिया इतने मे. और मै तुरंत अगली लोकल से दस मिनट मे पहुच चुका था उनके पास .  दिमाग अचानक से एसे हो गया कि मुझे अब अन्दरूनी शान्ती की जरूरत थी जो मुझे इन्ही के पास आके मिलती है.
"आओ तेरा ही इंतजार था इस कुर्सी को सुबह से " अमृत भैया ने एक टूटी कुर्सी को मेरी तरफ़ खिसकाते हुये कहा. जब भी आता हूँ अक्सर यही बैठने को मिलती है. टिकट काउन्टर वाली ओफ़िस मे एक अतिरिक्त कुर्सी है वो ही काफ़ी है. 
"हा सही है,  वैसे भी इसी के लायक हू आज तो मै '"
"मैने सुना है मन मे घातक बात छुपाने से हार्ट अटैक जल्दी आते है.  तू जल्दी बता हुआ क्या है.  " उसने हसते हुये पूछा क्युकी मै उदास अक्सर एसी बातो पे ही हुआ जिन पर दूसरो को हसी आती है. फ़िर मैने पूरा माजरा बताया उन्होने एक जोर की थप्पी गुद्धी पे मारी और बोलने लगे
" क्या बात है छोरे ,  सुना तो है मैने कई बार तेरे मुह से उसके बारे और आज बात ही हो गयी.  अच्छी बात है ये तो." 
" भैया वो बोली आओ कोफ़ी पीने आज हमारे इधर और मैने हा कर दी "
"आये हाये एक दिन मे ही ? थोडा धीरे चलो बाबू "
"वो सब तो ठीक है भैया पर सोच रहा हु जाना कहा है "
"क्यू,  इसमे सोचना क्या है "
"भैया , वो नम्बर तो देके ही नही गयी यार " मैने हरी घास सामने से हटा लेने पर बकरी की तरह मिनमिनाते हुये कहा. 
" अवे  पेवर...! कटवा आया सुबह सुबह आज तो.... ! ""  और ये कहते कहते उन्होने एक दबा के घूसा चेप दिया पीठ पे जोर के ठहाके के साथ .
"समझ नही आ रहा तू भुलक्कड है या तुझमे हिम्मत नही है , जब वो भी खुश है तो तू नर्वस क्यू होता है और तू तो इतने दिन से चाहता है उसको "
" मैने कब कहा था मै उसको चाहता हूँ भैया,  ..एवई क्यू बढा रहे हो बात को एक तो उसका नम्बर नही ले पाया और उपर से आप भी "
" हा नही चाहता इसीलिये तो उसकी जूतियो के डिजाइन से ले के उसके नेल पोलिश के रंग तक याद है तुझे, "
"आप तो बात को बढा रहे हो यार "
"हा अब ठीक है इतना दुखी क्यू हो रहा है रोजगार बाला आदमी और औरत दोनो ही रोज घर से निकलते है और वो तो जब से तुझे मिली है रोज ही निकलती है शनिवार रविवार को छोड़ के. "
"मतलब " मेरे समझ नही आया .
" अरे मेरी स्ट्रीट लाइट कल फ़िर आयेगी वो ओफ़िस , तब ले लेना नम्बर. इतना बिलबिला क्यू रहा है "
" हा यार मेरा ध्यान ही नही गया" मै ये बात को भूल ही गया था बिल्कुल कि कल फ़िर आयेगी महबूबा. खूब विराम दिया इन्होने मेरी आज कि विचलित मनोदशा को . एकदम से अब मन शान्त था. और फ़िर हम दोनो बकवास करते हुये लेमन टी पीने चले गये . जो हमारा लगभग रोज का काम है. 
Cont ...

मद्रास डायरी 2

मद्रास डायरी 2

उसके इस तरह मुस्कुराने से मै पोजीटिव फ़ील कर रहा था सोचा क्यू ना बात की जाये मोहतर्मा से,  वैसे भी जीवन मे कोई बकवास करने वाली है नही. 
"आप कहा काम करती है?" मैने पूरे कोन्फ़ीडेन्स के साथ आगे बात बढ़ाते हुये कहा . 
"यही.  मुंडकम्मनकोईल के पास है  IT कम्पनी है उसमे काम करती हू.!" उसने सहजता से जबाब दिया.  मै एक दफ़ा उसको देखता और फ़िर मोबाईल मे. भगवान लड़कियों को खूबसूरत बनाके क्या दिखाना चाहता है. लड़के तो मानो कोई सीमेन्ट फैक्टरी  मे मैनुफ़ैक्चर किये जाते हैं मृत्यु लोक मे ही! जलन होती है.  मद्रास मे गोरी लडकी देखके. जब उनको गिरना कलूटो की बाहो मे ही है तो गोरा बनाकर हमे क्यू जलाते हो. 
""आप नोर्थ से है ना?" उसने मेरे विचार कुरेदते हुये कहा . ये सवाल घर से दूर होने का एहसास करा गया. मैने  हा मे सिर हिलाया और उसने जरा से होठ हिला के पता नहीं क्या कहा पर लगा कि बढिया ही कहा होगा कुछ.
फ़िर हमने कुछ और बाते इधर उधर की शेयर की कुछ वो अपनी जोब के बारे मे बता रही थी कुछ मै अपनी भारतीय रैल की सेवा मे तत्परता के वारे मे बता रहा था.
सटेशन आने वाला था मेरा. मैने बैग सम्भाला और उतरने को रेडी हुआ ही था कि उसने पुछ लिया.
""आपका नाम क्या है?  "" उसने पूछा.  मखै लो बन्दी को अब तक नाम पता नहीं है. 
"""जी,  रिन्कू...  रिन्कू मीणा . ""
""आज आफ़्टरनून मे क्या कर रहे हो. """
"" कुछ नही, थोडा काम है  आधा एक घंटे का फ़िर फ़्री हू. "'
""तो आज आओ उधर घूमने कोफ़ी पिलाते है आपको. "" उसने एकदम अपने अलग अन्दाज मे कहा. एक ख्याल तो आया ये तो पद्मावत ने खिलजी को चाय पे बुलाया है. 
""बिल्कुल आते हैं.  आप बुलाये और हम नही आये ये तो बात की तौहीन हो जाउगी.  ""मैने उतावलेपन से कहा.  कोफ़ी का ओफ़र बाईगोड चलते हैं  3 बजे के आसपास शाम को घर वापस साथ साथ चलेन्गे.  मै पूरा प्लान चुका था.  मै सटेसन पर उसको बाय करके उतर गया आने का वादा भी देकर के. 
आज ... Cont.

मद्रास डायरी 1

मद्रास डायरी  1

हर रोज की तरह मै आज भी उसके सामने वाली सीट पर बैठ गया. यही होगी कोई 22-23 वर्ष के आसपास जीवन के अनुभव की युवती. हम दोनो का रोज office जाना इसी  train से होता है.  वो IT कम्पनी मे जोब करती है और हम 😂भारतीय रैल के नायाब हीरे एक रेलपथ अभियंता की हैसीयत से उसी के साथ office जाने का अनुभव लेते है. हालांकी मेरा महज 20 मिनट का सफ़र होता है जिसमे भी मै उसे नही देखता नजर सिर्फ़ मोबाईल की स्क्रीन पर होती है मस्ती की पाठशाला पे और उसको 25-30 मिनट और सफ़र करना है.  पर इन 20 मिनटो मे अलग ही तरह के अनुभव की प्राप्ति होती है . वो सोमवार से शुक्रवार जाती है हम सोमवार से रविवार जाते है 😂. आज मेरे बैठने के साथ उसने अपने पतले होठो से हल्की सी मुस्कान दी मै थोडा सहमा पर थोडा मुस्कुराया भी . सहमा इसलिए कि करीब  6-7 महीने के इस रूटीन मे आज पहली बार मुस्कुरायी थी. शायद ये सोचकर कि ढीठ छोरा है इसको रोज यही सीट पे बैठना है . मैने भी फ़िर मौके पे चौका मारा पूछ लिया -
- आप कहा काम करती है .
:- सोरी...??  दवी सी पर वजनदार आवाज मे उधर से जबाब आया. मै समझ गया छोरे तेरे भविष्य पर तो हिन्दी आती ही नही.  फ़िर मैने अपनी तरफ़ के पलड़े मे अंग्रेजी के दो वाक्य तौले -
- व्हेयर आर यू वर्किन्ग ??
- IT Cell मायलापुर .  एंड यू. 
- हेयर ओनली... रायपुरम... साउदर्न रैल्वे.  मैने मुस्कुराकर उस तरह की अंग्रेजी मे जबाब दिया जिस तरह की हिन्दी मे हमारे पूर्वजो से अंग्रेज गेहूँ मांगते थे. हिन्दी मे बताते है आगे का वार्तालाप आपको अब 😂. बात एक ही सुबह में इतनी बढ़ गयी थी कि लंच के बाद साथ मे कोफ़ी पीने का ओफ़र मिल गया और  मै ओफ़र नही छोड़ता. वो भी कन्या का इम्पोसीबल. 😂
वैसे इस कोफ़ी के चक्कर मे मेरी कोफ़ी ठंडी हो रही है ....😇😇


आगे भी है. 😂😂 सुननी है तो बने रहीये म्हारे साथ.  कथा सत्य है श्रोताओ.  😂😂

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

आदिवासीयो का काला दिवस

#समारकेला_खरसावा_गोलीकान्ड

उस वक्त देश की रियासतो का एकीकरण चल रहा था . झारखंड मे समारकेला-खरसावा एक मात्र देशी रियासत थी जो जमशेदपुर शहर से सटी हुई थी इस रियासत मे आदिवासीयो की बहुलता थी.  वो अपने अलग राज्य के लिये आजादी से पहले से संघर्ष कर रहे थे. एकीकरण के समय उड़ीसा चाहता था कि यह उड़ीसा मे शामिल हो क्युकी झारखंड का शासक उडिया भाषी था.  परंतु आदिवासी या तो अलग राज्य चाहते थे या बिहार मे विलय पर अडे थे.  जो की उड़ीसा राज्य सरकार को बहुत ही नागवार गुजरा.

आदिवासीयो पर उड़ीसा मे शामिल होने के लिये लगातार दबाब बनाया जा रहा था पर वे किसी भी हालत मे उड़ीसा मे जाना नही चाहते थे.विरसा मुँडा और कई आदिवासी मुखियाओ के नेतृत्व मे सभी आदिवासीयो ने खरसावा के गुरूवार हाट मे एकत्रित होकर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को ताकत दिखाने का फ़ैसला लिया गया ताकी दोनो सरकारे गौर फ़रमाये और हमे बिहार मे शामिल किया जाये.
इस योजना की खबर राज्य सरकार को लग गयी और उसने 17 दिसंबर 1947 से ही गुरूवार की हाट पर नजर रखना चालू कर दिया इसके लिये उड़ीसा सरकार की 3 टुकड़ीया तैनात की गयी मानो कोई युद्ध तैयारी हो.

1 जनवरी 1948 गुरुवार को खरसावा की हटिया मे 40,000-50,000 आदिवासी एकत्रित हुये और फ़ैसला सिर्फ़ एक तरफ़ा था या तो अलग राज्य या बिहार मे विलय.  इस चलती हाट मे जहा पूरा विश्व नये साल के जश्न मे डूबा था और देश आजाद हिन्दुस्तान का पहला नया साल मना रहा था महज 133 दिन बाद . इन 50,000 निहत्थे आदिवासीयो पर पुलिस ने गोलियां बरसाना चालू कर दिया . कई राउंड मे #अंधाधुन्ध_गोलीबारी हुई. हजारो आदिवासी मारे गये थे जिनमे हाट मे आये बच्चे और औरते भी शामिल है. इस घटना को इतने गुप्त तरीके से अन्जाम दिया गया की पास के राज्यो को भी खबर नही लगी. किसी भी मीडिया को वहा फ़टकने भी नही दिया गया था ताकी बाहर तक बात नही पहुचे. लाशो को खरसावा के कुओ मे डाला गया और ट्रको मे भरकर बीहडो मे जानवरो को फ़ेक दिया गया था. तब से 1 जनवरी आदिवासी #काला_दिवस के रुप मे मनाते है और शहीदो को #श्रद्धांजलि देते है.
जलियावाला हत्याकांड किताबो मे पढ़ाया जाता रहा है पर इस नरसंहार कही भी इतिहास मे कोई उल्लेख नही है. सिवाय #पुरखो की जुबा के कही सुनने को नही मिलता .

उन आदिवासीयो को आज तक उनका #हक नही मिला जो कि सिर्फ़ #जल_जंगल_और_जमीन है.  उनको दुनिया से कोई मतलब नही उनको बस उनकी जगह उनसे छीनी नही जाये पर वहा सरकार विकास के नाम पर जंगलो का सफ़ाया कर रही है.  जहा आदिवासीयो को जरुरत है वहा पर एक सड़क भी आज तक नही बनाई गयी. जब झारखंड अलग राज्य बना उम्मीद थी कि अब कुछ होगा पर आज भी वो ही 1948 के  हालातो  मे लोग जीवन जीते है

#काला_दिवस

इंतजार और बेरुखी

दशकभर का इंतजार और फिर उसका खत आया,  एक अरसे बाद आवाज सुनी और मैं सन्नाटे सा कंपाया।  फिर वाणीरस बरसा और मैं जैसे धोरों पर बादल इठलाया,  नाउ...