#समारकेला_खरसावा_गोलीकान्ड
उस वक्त देश की रियासतो का एकीकरण चल रहा था . झारखंड मे समारकेला-खरसावा एक मात्र देशी रियासत थी जो जमशेदपुर शहर से सटी हुई थी इस रियासत मे आदिवासीयो की बहुलता थी. वो अपने अलग राज्य के लिये आजादी से पहले से संघर्ष कर रहे थे. एकीकरण के समय उड़ीसा चाहता था कि यह उड़ीसा मे शामिल हो क्युकी झारखंड का शासक उडिया भाषी था. परंतु आदिवासी या तो अलग राज्य चाहते थे या बिहार मे विलय पर अडे थे. जो की उड़ीसा राज्य सरकार को बहुत ही नागवार गुजरा.
आदिवासीयो पर उड़ीसा मे शामिल होने के लिये लगातार दबाब बनाया जा रहा था पर वे किसी भी हालत मे उड़ीसा मे जाना नही चाहते थे.विरसा मुँडा और कई आदिवासी मुखियाओ के नेतृत्व मे सभी आदिवासीयो ने खरसावा के गुरूवार हाट मे एकत्रित होकर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को ताकत दिखाने का फ़ैसला लिया गया ताकी दोनो सरकारे गौर फ़रमाये और हमे बिहार मे शामिल किया जाये.
इस योजना की खबर राज्य सरकार को लग गयी और उसने 17 दिसंबर 1947 से ही गुरूवार की हाट पर नजर रखना चालू कर दिया इसके लिये उड़ीसा सरकार की 3 टुकड़ीया तैनात की गयी मानो कोई युद्ध तैयारी हो.
1 जनवरी 1948 गुरुवार को खरसावा की हटिया मे 40,000-50,000 आदिवासी एकत्रित हुये और फ़ैसला सिर्फ़ एक तरफ़ा था या तो अलग राज्य या बिहार मे विलय. इस चलती हाट मे जहा पूरा विश्व नये साल के जश्न मे डूबा था और देश आजाद हिन्दुस्तान का पहला नया साल मना रहा था महज 133 दिन बाद . इन 50,000 निहत्थे आदिवासीयो पर पुलिस ने गोलियां बरसाना चालू कर दिया . कई राउंड मे #अंधाधुन्ध_गोलीबारी हुई. हजारो आदिवासी मारे गये थे जिनमे हाट मे आये बच्चे और औरते भी शामिल है. इस घटना को इतने गुप्त तरीके से अन्जाम दिया गया की पास के राज्यो को भी खबर नही लगी. किसी भी मीडिया को वहा फ़टकने भी नही दिया गया था ताकी बाहर तक बात नही पहुचे. लाशो को खरसावा के कुओ मे डाला गया और ट्रको मे भरकर बीहडो मे जानवरो को फ़ेक दिया गया था. तब से 1 जनवरी आदिवासी #काला_दिवस के रुप मे मनाते है और शहीदो को #श्रद्धांजलि देते है.
जलियावाला हत्याकांड किताबो मे पढ़ाया जाता रहा है पर इस नरसंहार कही भी इतिहास मे कोई उल्लेख नही है. सिवाय #पुरखो की जुबा के कही सुनने को नही मिलता .
उन आदिवासीयो को आज तक उनका #हक नही मिला जो कि सिर्फ़ #जल_जंगल_और_जमीन है. उनको दुनिया से कोई मतलब नही उनको बस उनकी जगह उनसे छीनी नही जाये पर वहा सरकार विकास के नाम पर जंगलो का सफ़ाया कर रही है. जहा आदिवासीयो को जरुरत है वहा पर एक सड़क भी आज तक नही बनाई गयी. जब झारखंड अलग राज्य बना उम्मीद थी कि अब कुछ होगा पर आज भी वो ही 1948 के हालातो मे लोग जीवन जीते है
#काला_दिवस
उस वक्त देश की रियासतो का एकीकरण चल रहा था . झारखंड मे समारकेला-खरसावा एक मात्र देशी रियासत थी जो जमशेदपुर शहर से सटी हुई थी इस रियासत मे आदिवासीयो की बहुलता थी. वो अपने अलग राज्य के लिये आजादी से पहले से संघर्ष कर रहे थे. एकीकरण के समय उड़ीसा चाहता था कि यह उड़ीसा मे शामिल हो क्युकी झारखंड का शासक उडिया भाषी था. परंतु आदिवासी या तो अलग राज्य चाहते थे या बिहार मे विलय पर अडे थे. जो की उड़ीसा राज्य सरकार को बहुत ही नागवार गुजरा.
आदिवासीयो पर उड़ीसा मे शामिल होने के लिये लगातार दबाब बनाया जा रहा था पर वे किसी भी हालत मे उड़ीसा मे जाना नही चाहते थे.विरसा मुँडा और कई आदिवासी मुखियाओ के नेतृत्व मे सभी आदिवासीयो ने खरसावा के गुरूवार हाट मे एकत्रित होकर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को ताकत दिखाने का फ़ैसला लिया गया ताकी दोनो सरकारे गौर फ़रमाये और हमे बिहार मे शामिल किया जाये.
इस योजना की खबर राज्य सरकार को लग गयी और उसने 17 दिसंबर 1947 से ही गुरूवार की हाट पर नजर रखना चालू कर दिया इसके लिये उड़ीसा सरकार की 3 टुकड़ीया तैनात की गयी मानो कोई युद्ध तैयारी हो.
1 जनवरी 1948 गुरुवार को खरसावा की हटिया मे 40,000-50,000 आदिवासी एकत्रित हुये और फ़ैसला सिर्फ़ एक तरफ़ा था या तो अलग राज्य या बिहार मे विलय. इस चलती हाट मे जहा पूरा विश्व नये साल के जश्न मे डूबा था और देश आजाद हिन्दुस्तान का पहला नया साल मना रहा था महज 133 दिन बाद . इन 50,000 निहत्थे आदिवासीयो पर पुलिस ने गोलियां बरसाना चालू कर दिया . कई राउंड मे #अंधाधुन्ध_गोलीबारी हुई. हजारो आदिवासी मारे गये थे जिनमे हाट मे आये बच्चे और औरते भी शामिल है. इस घटना को इतने गुप्त तरीके से अन्जाम दिया गया की पास के राज्यो को भी खबर नही लगी. किसी भी मीडिया को वहा फ़टकने भी नही दिया गया था ताकी बाहर तक बात नही पहुचे. लाशो को खरसावा के कुओ मे डाला गया और ट्रको मे भरकर बीहडो मे जानवरो को फ़ेक दिया गया था. तब से 1 जनवरी आदिवासी #काला_दिवस के रुप मे मनाते है और शहीदो को #श्रद्धांजलि देते है.
जलियावाला हत्याकांड किताबो मे पढ़ाया जाता रहा है पर इस नरसंहार कही भी इतिहास मे कोई उल्लेख नही है. सिवाय #पुरखो की जुबा के कही सुनने को नही मिलता .
उन आदिवासीयो को आज तक उनका #हक नही मिला जो कि सिर्फ़ #जल_जंगल_और_जमीन है. उनको दुनिया से कोई मतलब नही उनको बस उनकी जगह उनसे छीनी नही जाये पर वहा सरकार विकास के नाम पर जंगलो का सफ़ाया कर रही है. जहा आदिवासीयो को जरुरत है वहा पर एक सड़क भी आज तक नही बनाई गयी. जब झारखंड अलग राज्य बना उम्मीद थी कि अब कुछ होगा पर आज भी वो ही 1948 के हालातो मे लोग जीवन जीते है
#काला_दिवस
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