गुरुवार, 11 जून 2020

पुरानी बाखड

#पुरानी_बाखड

बचपन का घर छूट गया था. कुछ और घर भी जिनके बच्चो के साथ हम गदहामार खेला करते थे. छूट नही गये है कुछ समय के चाल चलन ठीक नही इसलिए जरा बिछड गये है. सब ठीक होने के बाद फिर से सब वहीं होगा, ये उम्मीद दिल के कोने मे दफन है. पर कभी कभी सपनो मे पुराने की दस्तक से मन मे हलचल सी होती है तब ख्याल आता है कि जरा देख कर आऊ अपनी पुरानी बाखड को उस आंगन को जिसमे गड्ढे कर के हम सब भाई बहन कंचे खेलते थे.

एक लम्बी टूटी लोहे की चद्दर के दरवाजे को सरकाने के लिए हाथ लगाया ही था कि वह लकडी जिसके सहारे चद्दर थी टूटकर गिर गई और चद्दर भी खटण खटण की आवाज करती हुई. मानो यह सिर्फ नाम का दरवाजा नाराज है देर से आने पर. दो कदम आगे यह केसर श्यामा का बडा पेड, जो कभी अपने पीले फूलो से अपने नीचे की जगह पीली किये देता था, एकदम खूबसूरत, जिसका आधा हिस्सा बिखर बिखर कर बिखरा पडा है उसकी अंतिम पत्तियों के नीचे तक सूखा, बहुत सारा सूखा. सूखी टहनियां सूखे पत्तो का ढेर. पेड आधे पीले पत्तो और आधे हरे पत्तो के वजन मे है और उसकी टूटी हुई उसी मे अटकी छोटी सूखी टहनियों का वजन भी. आंगन मे पहूंचा तो देखा कि एक चारपाई पड़ी है जिस पर दोनों छोटे भाई झगड रहे है तब ही एक कबूतर की फडफडाहट से ध्यान टूटा तो पाया कि आंगन मे आवारा पशु के गोबर के अलावा कुछ भी नही है. पीछे का दरवाजा टूटा पडा है शायद वही से अंदर आ जाते होंगे. लकडी की  पट्टीयो का पुराना बैंगनी रंग का पुश्तैनी दरवाजा, जिसकी देहरी दरवाजे से ही आधा फीट उपर है, जिस पर नये जमाने का ताला लटका है. अलीगढ़ का ताला है पापा लाये थे तब बोले थे उस पर कुछ लिखा पढकर. पर जंग लग चुकी है  इस पर भी. सूनी छोड दी गई हर चीज पर जंग लग जाती है. मै ताला खोलना चाह रहा हूं पर चाबी कहा है पता नही. ढूंढता हूं शायद कही मिल जाये. हा... अब एक जंग लगी चाबी मिली है जहां हम छिपाकर रखते थे दरवाजे के बगल से पर इसमे कुछ ज्यादा ही जंग लगी हुई है. ताला खुल नही रहा है इससे. घर्र की आवाज के साथ ताला खुलने को.....|

"चाय पी लो ... और कितना सोयेगा बेटा."
"मां तुम...?" मै चौंक गया. सुबह के साढे छ: बजे थे.
"क्यू क्या हुआ?"
"कुछ नही बस... ऐसे ही. कोई सपना था. मां जरा पानी का मग देना और चाय यहा नीचे रख दो मै लें लुंगा."

शायद ताला खुल जाता उस चाभी से. मै अंदर देखना चाह रहा था कि अखबार बिछा सजाई जाने वाली अलमारियां अब कैसी दिखती है. कितना तितर बितर है वह दराज जिसमे छोटा भाई अपना कब्जा जमाये रहता हमेशा. मै देखना चाह रहा था कि इस कच्चे घर मे तार की अलघनी पर एक छाता छोडकर गये थे, क्यूकी वह टूटा हुआ था तो उसमे किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई थी, क्या वह पूरी तरह गल चुका है. उसका बस तारो का गुच्छा सा दिखता होगा. मुझे देखना था कि हर बरसात मे हम छत मे कई जगह काली मिट्टी लगाकर बारिश का पानी रोकते थे. अब बिना रोके कितनी जगहो से पानी गिरता होगा उसके निशान बने होंगे अंदर छत पर. टूटी छत से होकर  कितनी जगह धूप अंदर गिरती होगी. और भी बहुत कुछ देखना था मुझे. खैर...... यह ताला खुला कभी तो जरूर बताऊंगा.

दिल जयपुरी

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