बुधवार, 29 जनवरी 2020

दिल का...

#दिल_का
साल बीतने को है और जहा इस के प्रारंभ मे पहले दिन मैंने खुद को इसके अंत मे देखना सोचा था वहा तक पहुच नहीं पाया. पूर्णतः असफल रहा इस वर्ष मैं. वज़ह खुद हू. वक़्त को दोष नहीं दे सकता क्युकी मुझे पता है कि कोई भी काम आसान नहीं होता और सम्पूर्ण रूप से उसमे शत प्रतिशत देना बहुत ही जरूरी है चाहे जो भी आप करना चाहो. शत प्रतिशत दे नहीं पाया. इसकी वज़ह मेरा आलसीपन भी है इसकी वज़ह मेरा वक़्त वे वक़्त की नौकरी भी है और इसकी वज़ह कहीं हद तक यह भी है कि मुझे प्रेरक बहुत ही कम मिले है या यू कहू की प्रेरको की तुलना मे आलोचको से ज्यादा भर गया इस साल मै. हालांकि तकलीफ मुझे किसी से नही है पर प्रेरको की भूमिका हमारे जीवन मे बहुत महत्व रखती है और ऐसा तो है नही कि आप यू-ट्यूब फेसबुक पर देखकर ही सब कुछ सीख लो कही न कही जरूरत महसूस होती है अच्छे मार्गदर्शक की जो आपको समझ सके राह दिखा सके सही गलत बता सके. पर मै इस बात को भी दोष नही दे सकता क्युकी कितने सारे सफल व्यक्ति है जिन्हे सिर्फ तोडने वाले ही मिले पर रास्ते से भटका नही पाया कोई उन्हे. मै  खुद को बहुत परिश्रमी मानता था पर इस महीने के बीतते बीतते पता चल गया कि इसके बिल्कुल विपरित बहुत नालायक हू मै जो ठीक से खुद को भी संभाल नही पाता सपने पूरे करना तो दूर की बात है. सपने संजोना आसान है परन्तु वास्तविकता मे ढाल पाना बहुतई मुश्किल भी है. जो इस बरस नही कर पाया. एक दोस्त की बात याद आती है कि तुमसे ना हो पायेगा. पर मन कहता है कि क्यू नही हो पायेगा. जब मन एकाग्र होता है तो कुछ ऐसा भी कर देता है कि बाद मे विश्वास नही होता खुद से किया है यह चुनौतिपूर्ण काम. पर उसी पर कुछ दोस्त तंज भी कसते है जिनसे मुझे छटांक भर फर्क नही पडता. हा पर ये बात तो है कि मेरा नजरिया सकारात्मक ज्यादा है और पीछे नही हटता मै किसी भी चुनौती से. आदत ही नही है ऐसी. इस साल के पहले दिन से आज के दिन तक एक भी दिन या रात एसा नही गया कि मै अपने गोल को छूकर नही लौटा. जो मुझमे इस बात की तसल्ली देता है कि आलसी तो हू पर भूलने वाला नही और जो भूलता नही वह सपनो को वास्तविक रूप जरूर देता है. माना कि आसान नही है पर इस जहां मे असम्भव भी कुछ नही है. जब सब कर सकते है तो हम भी कर सकते है. पूरा एक वर्ष करते करते बीस से तीस प्रतिशत तक बमुश्किल जोड तोड कर पहुंच रहा हू अगर हिसाब लगाऊ तो. पर एक दिन सौ तक भी यह आंकडा हम ही पहुचायेंगे. देर से ही सही थोडा वक्त और लगेगा पर... कर लेंगे. कोशिश रहेगी आलस छोड दिया तो अगले साल के अंत से पहले तक कुछ नया करने की. जिसकी अभी कठोर तपस्या के माफिक मेहनत करनी पडेगी. अब बदलाव के लिए यह तो पहला कदम है ही. बिना दौड़ तो शेर को भी खाना नही मिलता.
हा पर एक बात है कि इस वरष किताबे पढने का शौक जरूर खूब पूरा किया है मैने और अब तक चल रहा है. कुछ बेहतरीन उपन्यास कुछ बेहतरीन छोटी कहानियां पढते पढते तो जैसे हिन्द युग्म का तो प्रशंसक बन गया हू.

#दिल_जयपुरी

रत्तीभर सुकून

हरजाई जहां समां पराया सा
फिर भी मैं मौन की तलाश में हूं
इस बिलबिलाती दुनिया में
मै रत्तीभर सुकून की तलाश मे हूं

हिम से हिन्द तक शान्त की तलाश मे हूं
जलते घर बिखरते लोगो के बीच
नफरत से पार प्यार की तलाश में हूं
मै रत्तीभर सुकून की तलाश मे हूं

सामने की घृणा से पीछे की मुस्कान तक
उस छिपे रश्क की तलाश मे हूं
तेरे मेरे मेरे तेरे से हमारे तक के
कुछ  मीठे बोल की तलाश मे हूं

हा इस बिलबिलाती दुनिया में
मै रत्तीभर सुकून की तलाश मे हूं

#दिल_जयपुरी #मोहब्बत #एफोर_की_खाली_शीट
#द_रेड_इंक
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मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019

किरदार

जीवन के कुछ पड़ाव एसे होते है जहा हम हमारी ही जिन्दगी का कोई दूसरा किरदार ढूँढ रहे होते है. थके हारे मन से रोज रोज की समझाईश भरे समझौतो से उब चुके होते हैं. उस वक्त चाहते हैं कि अब ये अभिनय कोई और करे तो बेहतर हो. परंतु जिस प्रकार गधे के आगे घास लटका कर आगे बढ़ने को बांधित किया जाता है ठीक उसी प्रकार प्रकृति भी कुछ न कुछ लालच देती रहती है और हम भी आगे बढ़ते रहते हैं.

पिछले  चार पांच दिन बड़े जोर से फ़ीवर से प्रताड़ित किया हुआ था तब मेरे मन में ख्याल आता रहता कि बीमार होना जरूरी है?  अगर हैं तो लाईफ़ का पूरा सुख भरा हिस्सा एक बार और पूरा दुख भरा हिस्सा एक बार करके सिर्फ़ दो ही हिस्सों मे भी तो बाँटा जा सकता है पूरे जीवन को. थोड़े थोड़े समय में उतार चढ़ाव आना जरुरी है? इसी बीच एक मित्र की बात याद आयी कि अगर हम इतने सही मैनेजमेंट कर सकने वाले होते/ सम्भालने वाले होते तो हम बीमार ही नहीं पड़ते ना ही उतार चढ़ाव बगैरा की फ़िक्र होती और सब कुछ सुव्यवस्थित चल रहा होता .

हर रोज की तरह आज शाम को कब्रिस्तान के सामने नसीर चाचा की चाय की दुकान पर जा बैठा. गुड वाली चाय ज्यादा पसंद है सो चाचा रोज गुड वाली चाय पिलाता है. यहा रोज एक बुड्ढे को एक आठ साल के बच्चे के साथ रोज गुजरते देखता हूँ. वह उस बच्चे को पार्क लेकर जाता है या उस वक्त लौट रहा होता है.  मुझे यह जोड़ी बहुत प्यारी लगती है. पर आज वो नही दिखाई दिये मैने घड़ी मे टाइम देखा तो मै तो अपने टाइम पर था पर वो नहीं.  मैने उत्सुकता से नसीर चाचा को पूछ लिया कि आज दो नही दिखाये दिये तो जबाब मिला " जनाब जिन दो की रोज तुम बात करते हो दरअसल वो कभी थे ही नहीं.  सिर्फ़ आपको ही क्यू लगता है कि आप देखते उनको. " थोडा संकोचित भाव मेरे चेहरे पर था पर कुछेक मिनट बाद फ़िर से मै एक नया किरदार ढूँढ रहा था.

ट्रैवलर_थॉट

#ट्रैवलर_थॉट😊😊

फ़ाईनली बच्चा चुप हो गया है. रात को ठंड लग गयी थी तो जुखाम खासी से परेशान था.  बच्चो को दवाई पिलाना भी बड़ी मशक्कत का काम है जो एक मां बखूबी कर लेती है. जिस काम को देखकर ही पिता को लगता है कि यह कैसे हो पायेगा वो काम मां आसानी से सम्भाल लेती है. मां का कोई ओप्शन नही दिया इस प्रकृति ने. हो भी नही सकता.

बच्चे ने तबाही मचा रखी है जब से चढ़ा है ट्रेन में.  कभी इधर कभी उधर.  मुझे भी मजा आ रहा है इसके साथ खेलने मे.  आजाद छोटे छोटे हाथ, मासूम सा चेहरा जिस पर फ़िक्र की भनक तक नहीं , छोटे छोटे उछल कूद करते पैर , चिल्लाने की कोई मनाही नही, किल कारी जब मन किया मार दी. ना ये पता कहा जा रहे हैं , ना ये पता कब तक उतरेन्गे, ना ये पता वापस भी आना है.  हर फ़िक्र से बेख़बर बचपन. बचपन मे सब एसे ही होते है ना.

परंतु एक चीज है जो बदल गयी वक्त के साथ. जब हम बच्चे थे इतना दुलार नही करते थे मां बाप.  इसलिये नही कि प्यार कम करते थे बल्कि हमारे माता पिता का विश्वास इस बात मे ज्यादा था कि बच्चे को खुद करने दो जो भी करना है. गिर गया खुद ही सम्भल के खडा होगा , आजकल जिस तरह लाड बच्चो को लडाया जाता है वो कुछ अलग तरह का लगता है.  मै लाड लड़ाने के खिलाफ नही हू.  मुझे इस बचपन मे प्रकृति के साथ वक्त बिताने की जगह आधुनिक सुख सुबिधाओ के साथ वक्त बिताने से परहेज है. आजकल के मां बाप अपने
बच्चो के हाथ मिट्टी में गंदे नहीं होने देते उनको लगता है कि कोई इन्फ़ेक्शन हो जायेगा.  एक हम थे कि सारा दिन मिट्टी मे खेलते निकलता था और कुछ नहीं होता था.  ज्यादा स्वस्थ्य रहते थे. बच्चो को पडोसीयो के घर नहीं जाने देते हैं जबकी हम हमेशा ही साथ मे खेलते थे. ये भी बात है कि आजकल के पैरैंट्स थप्पड़ मारना नही जानते जबकी हमे दिन भर लात जूतो से प्यार मिला है बापू का जिसके चलते कभी गलत करने हिमाकत नही हूई.  आज तक दिमाग और शरीर कंट्रोल मे रहता है उन्ही जूतियो के कारण.  आजकल के लड़के कुछ भी करते नही थकते क्यूकी जूतियो का डर कभी नहीं हुआ उनको. इस तरह का बदलाब हमारे बच्चो से एक बेहतरीन बचपन छीनना है.  इस तरह के ओवर प्रोट्रेक्टिव विहेवीयर से मुझे परहेज है. ट्रेन में बच्चो के इधर उधर घूमने को लेकर भी माता पिता के मन में होता है कि उधर मत जाओ सिर्फ़ सीट पर ही रहो.  पता नहीं क्यू बच्चो से उनकी आजादी छीनी जा रही है  जिनके वो हकदार होते है.

ये ही बच्चे जब बड़े होंगे और किसी राईटर का  बचपन किसी किताब मे पढ़ेंगे तब इनके मन में ये बात जरुर आयेगी कि काश एसा बचपन हमे भी नसीब होता. और उसके जिम्मेदार हम होंगे.

देहात से

#देहात_से

पहले लोग बैलगाड़ी से चलते थे जैसे आजकल उनकी जगह ट्रैक्टर ने ले ली. मैडी गाव की तरफ़ से गाव आते टाइम देर शाम को कुतुकपुर के बाबा भौर्या ने कटकड की नदी की ढलान पर बैलगाड़ी उतारी ही थी कि एक नौजवान लिफ़्ट मांग बैठा. थोडा अधेरा हो गया पर मौसम साफ़ था बिल्कुल. ढलान के दोनो तरफ़ मैडी और कटकड दोनो गावो की ओर बड़े बड़े बीहड़ जैसे टीले है. कटकड की चढाई एकदम से सीधी पड़ती है.
"बाबा नदी पार करा दे थोडा अधेरा हो गया कटकड के अड्डा पर उतर जाउन्गा". 
"ए भैया आजा बैठ जा ". बाबा भौर्या ने कहकर बुला लिया.
वह नौजवान बैलगाड़ी मे बैठ गया पीछे की तरफ़ पैर लटका कर. उसको बैठते ही बैलो ने बिदकना चालू कर दिया हल्का हल्का परंतु नदी मे बैलो का बिदकना रोज की बात थी कारण आगे पता चल जायेगा. इसलिये बाबा ने तनिक भी ध्यान इस बात पर नही दिया . अब कटकड की चढाई चालू हुई तो बैल परेशान होने लग गये पर जैसे तैसे आधी चढाई पूरी कर ली और अब बैलो की गर्दन के नीचे वाला पट्टा उपर जाकर उनकी गर्दन पर भिचाव देने लग गया अर्थात गाड़ी उलणडने लग गयी.
 बाबा ने बिना देखे आवाज लगायी कि "भाया थोडा आगे आजा गाड़ी उलड रही है तू ज्यादा पीछे बैठा है". पर नो रेस्पोन्स .
उसने फ़िर आवाज लगायी "भैया आगे आजा नेक गाडो उलड रोय " फ़िर नो रेस्पोन्स.
छोकड का पेड़ , जो कि आधी चढाई से थोडा उपर है, आते आते बैल ज्यादा बिदकने लग गये और उनका गला उस पट्टे से भिचा जा रहा था बिल्कुल. तब बाबा ने पीछे मुड़कर उसको फ़िर से कहना चाहा कि "मेरे पास आगे आजा बैल परेशान हो जाएंगे " पर उसके मुह से इसके बजाय अनायास ही निकला " तेरी जीजीय.... म्हारे साडे अथ कर राखि है कतई बैल हाफ़ ने लगगे " बाबा ने बैल वाले चामटे से पीछे बैठे नौजवान को
 के मारा जिसके पैर पीछे नदी तक घसीडते हुये आ रहे थे. और सफ़ेद झक्क कपड़ो मे चुपचाप बैठा था.
" बाबा हफ़ा तो तेरे कू भी देतो पर संग रखवालो चल रोय तेरो " वह बोला.
वह भूत था. उनको वरदान होता है कि वो बैलगाड़ी के मांदडे   (पहिये के एक्सल) से आगे नही बढ़ सकते है.  बैलो की तरफ़ आगे. जानवर को रात मे भूत आसानी से दिख जाते है इसीलिये नदी मे  बैलो का बिदकना आम बात है . बड़े बूढे लोग भूतो से नही डरते है. और नदी मे नसीर बाबा का मंदिर है जिसकी वजह से भूत तो रोज दिखते रहते है पर नुकसान नही कर पाते ये.
एसा बहुतो ही बार हुआ है कटकड की नदी पर..

#दिल_जयपुरी

देहात से

#देहात_से

"अरी कितने के कितने दिये है दिये "
" दस के बीस है अम्मा " कुम्हारिन बोली.
" अरे हम्बे, जे माटी को भी सोना बना नाही दिये हो तुम जो इतना महंगा बेच रही हो . दस के तीस दो तो दे दो  बीस रुपैया के "
" ये  लो पूरे साठ है  "
" तुमने तो पहले से भरके रखे है इनमे टूटे दिये होंगे तो?  मै खुद छाँट कर लुन्गी. सब के सब एसे ही है.  कोई जला हुआ , कोई टूटा हुआ और सिराही कितने की दी है? "
" पांच की दो "
" बीस रुपैया के  दिये लिये है दो सिराही तो एसे ही दे देती,  कहा ले जायेगी इतना पैसा "
" अम्मा तुमको दिये है बीस मे साठ वरन हम  दस के बीस से ज्यादा किसी को नाही देते,  लेना है तो लो नही तो आगे बढ़ो " कुम्हारिन ने इस बार सख्ती दिखा दी.
" अरे!  तुम तो बिफ़र गयी. दिये बेच रही हो या जबरदस्ती वाला धंधा कर रही हो. एक तो इनमे एक भी दिया ठीक नही है उपर से एक सिराही तक ना ज्यादा दे रही और अब एसे बात कर रही हो जैसे नही खरीदे तो मार ही डालोगी. देख लो साठ दिये है पूरे गिन लो और ये लो तुम्हारे बीस रुपये. "

अम्मा ने साठ दिये थैले मे दिखा कर कुम्हारिन को पैसे देते हुये कहा जो उसने खुद चुन चुन कर लिये है दिये के ढेर से. सिराही साथ मे मुफ़्त देने से मना कर दिया तो पारा सर चढ़ गया अम्मा का. कुम्हारिन मुफ़्त मे क्यू देगी भई आखिर कितनी मेहनत लगती है मिट्टी के दिये बनाने मे. महीनो पहले से तैयारी शुरु कर दी जाती है तब जाके बनकर तैयार होते है और कल शाम को ही मंदिर के ठीक सामने वाली जगह रोकी जो अलग , खिलोने वाले से झगडा करना पड़ गया क्यूकी उसने दो दिन पहले ये जगह अपनी दुकान के लिये फ़िक्स कर दी थी पर कल शाम पहले कुम्हारिन ने आ लगायी दुकान. शहरी औरते दिनभर पैसा उड़ा सकती है पर दो दो रुपये पर गरीब आदमी से बहस करने की आदत है . जाने तो इनके कुछेक रुपयो से उनके अमीरी आ गयी तो ये खुद को माफ़ नही कर पायेंगी .

पहले ठीक था गाव मे ही गाव वाले लेने आ जाते थे कुम्हारो के घर ही... दिया,  सिराही, भोलुआ सब कुछ वो भी नये अनाज से . परंतु अब गावो मे लाइट और मोमबत्ती ने जगह ले ली... और शहरी, शहरी अब दियो को मोडर्न दीपक की नजर से देखते है ना कि परम्परा रीति रिवाज की नजर से.

#दिल_जयपुरी

रविवार, 13 अक्टूबर 2019

अहसास

चाय को सुडक कर एक सेकंड मुह मे रोककर  फ़िर निगलने पर असली स्वाद आता है उसका.

किसी चीज  को  टक टकी लगाये कोई दस सेकंड बिना सोचे/observe/ मतलब के सिर्फ़ देखनेभर के पल का अहसास .

सड़क पर खाली बोटले उठाते उस छ साल के बच्चे से नजरे मिलाने से दिल मे उठने वाली अजीब सी अकारण आत्मगिलानी.

कितना कुछ है जीवन मे जो हमारे होने
का अहसास कराता है

इंतजार और बेरुखी

दशकभर का इंतजार और फिर उसका खत आया,  एक अरसे बाद आवाज सुनी और मैं सन्नाटे सा कंपाया।  फिर वाणीरस बरसा और मैं जैसे धोरों पर बादल इठलाया,  नाउ...