#देहात_से
"अरी कितने के कितने दिये है दिये "
" दस के बीस है अम्मा " कुम्हारिन बोली.
" अरे हम्बे, जे माटी को भी सोना बना नाही दिये हो तुम जो इतना महंगा बेच रही हो . दस के तीस दो तो दे दो बीस रुपैया के "
" ये लो पूरे साठ है "
" तुमने तो पहले से भरके रखे है इनमे टूटे दिये होंगे तो? मै खुद छाँट कर लुन्गी. सब के सब एसे ही है. कोई जला हुआ , कोई टूटा हुआ और सिराही कितने की दी है? "
" पांच की दो "
" बीस रुपैया के दिये लिये है दो सिराही तो एसे ही दे देती, कहा ले जायेगी इतना पैसा "
" अम्मा तुमको दिये है बीस मे साठ वरन हम दस के बीस से ज्यादा किसी को नाही देते, लेना है तो लो नही तो आगे बढ़ो " कुम्हारिन ने इस बार सख्ती दिखा दी.
" अरे! तुम तो बिफ़र गयी. दिये बेच रही हो या जबरदस्ती वाला धंधा कर रही हो. एक तो इनमे एक भी दिया ठीक नही है उपर से एक सिराही तक ना ज्यादा दे रही और अब एसे बात कर रही हो जैसे नही खरीदे तो मार ही डालोगी. देख लो साठ दिये है पूरे गिन लो और ये लो तुम्हारे बीस रुपये. "
अम्मा ने साठ दिये थैले मे दिखा कर कुम्हारिन को पैसे देते हुये कहा जो उसने खुद चुन चुन कर लिये है दिये के ढेर से. सिराही साथ मे मुफ़्त देने से मना कर दिया तो पारा सर चढ़ गया अम्मा का. कुम्हारिन मुफ़्त मे क्यू देगी भई आखिर कितनी मेहनत लगती है मिट्टी के दिये बनाने मे. महीनो पहले से तैयारी शुरु कर दी जाती है तब जाके बनकर तैयार होते है और कल शाम को ही मंदिर के ठीक सामने वाली जगह रोकी जो अलग , खिलोने वाले से झगडा करना पड़ गया क्यूकी उसने दो दिन पहले ये जगह अपनी दुकान के लिये फ़िक्स कर दी थी पर कल शाम पहले कुम्हारिन ने आ लगायी दुकान. शहरी औरते दिनभर पैसा उड़ा सकती है पर दो दो रुपये पर गरीब आदमी से बहस करने की आदत है . जाने तो इनके कुछेक रुपयो से उनके अमीरी आ गयी तो ये खुद को माफ़ नही कर पायेंगी .
पहले ठीक था गाव मे ही गाव वाले लेने आ जाते थे कुम्हारो के घर ही... दिया, सिराही, भोलुआ सब कुछ वो भी नये अनाज से . परंतु अब गावो मे लाइट और मोमबत्ती ने जगह ले ली... और शहरी, शहरी अब दियो को मोडर्न दीपक की नजर से देखते है ना कि परम्परा रीति रिवाज की नजर से.
#दिल_जयपुरी
"अरी कितने के कितने दिये है दिये "
" दस के बीस है अम्मा " कुम्हारिन बोली.
" अरे हम्बे, जे माटी को भी सोना बना नाही दिये हो तुम जो इतना महंगा बेच रही हो . दस के तीस दो तो दे दो बीस रुपैया के "
" ये लो पूरे साठ है "
" तुमने तो पहले से भरके रखे है इनमे टूटे दिये होंगे तो? मै खुद छाँट कर लुन्गी. सब के सब एसे ही है. कोई जला हुआ , कोई टूटा हुआ और सिराही कितने की दी है? "
" पांच की दो "
" बीस रुपैया के दिये लिये है दो सिराही तो एसे ही दे देती, कहा ले जायेगी इतना पैसा "
" अम्मा तुमको दिये है बीस मे साठ वरन हम दस के बीस से ज्यादा किसी को नाही देते, लेना है तो लो नही तो आगे बढ़ो " कुम्हारिन ने इस बार सख्ती दिखा दी.
" अरे! तुम तो बिफ़र गयी. दिये बेच रही हो या जबरदस्ती वाला धंधा कर रही हो. एक तो इनमे एक भी दिया ठीक नही है उपर से एक सिराही तक ना ज्यादा दे रही और अब एसे बात कर रही हो जैसे नही खरीदे तो मार ही डालोगी. देख लो साठ दिये है पूरे गिन लो और ये लो तुम्हारे बीस रुपये. "
अम्मा ने साठ दिये थैले मे दिखा कर कुम्हारिन को पैसे देते हुये कहा जो उसने खुद चुन चुन कर लिये है दिये के ढेर से. सिराही साथ मे मुफ़्त देने से मना कर दिया तो पारा सर चढ़ गया अम्मा का. कुम्हारिन मुफ़्त मे क्यू देगी भई आखिर कितनी मेहनत लगती है मिट्टी के दिये बनाने मे. महीनो पहले से तैयारी शुरु कर दी जाती है तब जाके बनकर तैयार होते है और कल शाम को ही मंदिर के ठीक सामने वाली जगह रोकी जो अलग , खिलोने वाले से झगडा करना पड़ गया क्यूकी उसने दो दिन पहले ये जगह अपनी दुकान के लिये फ़िक्स कर दी थी पर कल शाम पहले कुम्हारिन ने आ लगायी दुकान. शहरी औरते दिनभर पैसा उड़ा सकती है पर दो दो रुपये पर गरीब आदमी से बहस करने की आदत है . जाने तो इनके कुछेक रुपयो से उनके अमीरी आ गयी तो ये खुद को माफ़ नही कर पायेंगी .
पहले ठीक था गाव मे ही गाव वाले लेने आ जाते थे कुम्हारो के घर ही... दिया, सिराही, भोलुआ सब कुछ वो भी नये अनाज से . परंतु अब गावो मे लाइट और मोमबत्ती ने जगह ले ली... और शहरी, शहरी अब दियो को मोडर्न दीपक की नजर से देखते है ना कि परम्परा रीति रिवाज की नजर से.
#दिल_जयपुरी
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