मंगलवार, 29 अक्टूबर 2019

ट्रैवलर_थॉट

#ट्रैवलर_थॉट😊😊

फ़ाईनली बच्चा चुप हो गया है. रात को ठंड लग गयी थी तो जुखाम खासी से परेशान था.  बच्चो को दवाई पिलाना भी बड़ी मशक्कत का काम है जो एक मां बखूबी कर लेती है. जिस काम को देखकर ही पिता को लगता है कि यह कैसे हो पायेगा वो काम मां आसानी से सम्भाल लेती है. मां का कोई ओप्शन नही दिया इस प्रकृति ने. हो भी नही सकता.

बच्चे ने तबाही मचा रखी है जब से चढ़ा है ट्रेन में.  कभी इधर कभी उधर.  मुझे भी मजा आ रहा है इसके साथ खेलने मे.  आजाद छोटे छोटे हाथ, मासूम सा चेहरा जिस पर फ़िक्र की भनक तक नहीं , छोटे छोटे उछल कूद करते पैर , चिल्लाने की कोई मनाही नही, किल कारी जब मन किया मार दी. ना ये पता कहा जा रहे हैं , ना ये पता कब तक उतरेन्गे, ना ये पता वापस भी आना है.  हर फ़िक्र से बेख़बर बचपन. बचपन मे सब एसे ही होते है ना.

परंतु एक चीज है जो बदल गयी वक्त के साथ. जब हम बच्चे थे इतना दुलार नही करते थे मां बाप.  इसलिये नही कि प्यार कम करते थे बल्कि हमारे माता पिता का विश्वास इस बात मे ज्यादा था कि बच्चे को खुद करने दो जो भी करना है. गिर गया खुद ही सम्भल के खडा होगा , आजकल जिस तरह लाड बच्चो को लडाया जाता है वो कुछ अलग तरह का लगता है.  मै लाड लड़ाने के खिलाफ नही हू.  मुझे इस बचपन मे प्रकृति के साथ वक्त बिताने की जगह आधुनिक सुख सुबिधाओ के साथ वक्त बिताने से परहेज है. आजकल के मां बाप अपने
बच्चो के हाथ मिट्टी में गंदे नहीं होने देते उनको लगता है कि कोई इन्फ़ेक्शन हो जायेगा.  एक हम थे कि सारा दिन मिट्टी मे खेलते निकलता था और कुछ नहीं होता था.  ज्यादा स्वस्थ्य रहते थे. बच्चो को पडोसीयो के घर नहीं जाने देते हैं जबकी हम हमेशा ही साथ मे खेलते थे. ये भी बात है कि आजकल के पैरैंट्स थप्पड़ मारना नही जानते जबकी हमे दिन भर लात जूतो से प्यार मिला है बापू का जिसके चलते कभी गलत करने हिमाकत नही हूई.  आज तक दिमाग और शरीर कंट्रोल मे रहता है उन्ही जूतियो के कारण.  आजकल के लड़के कुछ भी करते नही थकते क्यूकी जूतियो का डर कभी नहीं हुआ उनको. इस तरह का बदलाब हमारे बच्चो से एक बेहतरीन बचपन छीनना है.  इस तरह के ओवर प्रोट्रेक्टिव विहेवीयर से मुझे परहेज है. ट्रेन में बच्चो के इधर उधर घूमने को लेकर भी माता पिता के मन में होता है कि उधर मत जाओ सिर्फ़ सीट पर ही रहो.  पता नहीं क्यू बच्चो से उनकी आजादी छीनी जा रही है  जिनके वो हकदार होते है.

ये ही बच्चे जब बड़े होंगे और किसी राईटर का  बचपन किसी किताब मे पढ़ेंगे तब इनके मन में ये बात जरुर आयेगी कि काश एसा बचपन हमे भी नसीब होता. और उसके जिम्मेदार हम होंगे.

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