जीवन के कुछ पड़ाव एसे होते है जहा हम हमारी ही जिन्दगी का कोई दूसरा किरदार ढूँढ रहे होते है. थके हारे मन से रोज रोज की समझाईश भरे समझौतो से उब चुके होते हैं. उस वक्त चाहते हैं कि अब ये अभिनय कोई और करे तो बेहतर हो. परंतु जिस प्रकार गधे के आगे घास लटका कर आगे बढ़ने को बांधित किया जाता है ठीक उसी प्रकार प्रकृति भी कुछ न कुछ लालच देती रहती है और हम भी आगे बढ़ते रहते हैं.
पिछले चार पांच दिन बड़े जोर से फ़ीवर से प्रताड़ित किया हुआ था तब मेरे मन में ख्याल आता रहता कि बीमार होना जरूरी है? अगर हैं तो लाईफ़ का पूरा सुख भरा हिस्सा एक बार और पूरा दुख भरा हिस्सा एक बार करके सिर्फ़ दो ही हिस्सों मे भी तो बाँटा जा सकता है पूरे जीवन को. थोड़े थोड़े समय में उतार चढ़ाव आना जरुरी है? इसी बीच एक मित्र की बात याद आयी कि अगर हम इतने सही मैनेजमेंट कर सकने वाले होते/ सम्भालने वाले होते तो हम बीमार ही नहीं पड़ते ना ही उतार चढ़ाव बगैरा की फ़िक्र होती और सब कुछ सुव्यवस्थित चल रहा होता .
हर रोज की तरह आज शाम को कब्रिस्तान के सामने नसीर चाचा की चाय की दुकान पर जा बैठा. गुड वाली चाय ज्यादा पसंद है सो चाचा रोज गुड वाली चाय पिलाता है. यहा रोज एक बुड्ढे को एक आठ साल के बच्चे के साथ रोज गुजरते देखता हूँ. वह उस बच्चे को पार्क लेकर जाता है या उस वक्त लौट रहा होता है. मुझे यह जोड़ी बहुत प्यारी लगती है. पर आज वो नही दिखाई दिये मैने घड़ी मे टाइम देखा तो मै तो अपने टाइम पर था पर वो नहीं. मैने उत्सुकता से नसीर चाचा को पूछ लिया कि आज दो नही दिखाये दिये तो जबाब मिला " जनाब जिन दो की रोज तुम बात करते हो दरअसल वो कभी थे ही नहीं. सिर्फ़ आपको ही क्यू लगता है कि आप देखते उनको. " थोडा संकोचित भाव मेरे चेहरे पर था पर कुछेक मिनट बाद फ़िर से मै एक नया किरदार ढूँढ रहा था.
पिछले चार पांच दिन बड़े जोर से फ़ीवर से प्रताड़ित किया हुआ था तब मेरे मन में ख्याल आता रहता कि बीमार होना जरूरी है? अगर हैं तो लाईफ़ का पूरा सुख भरा हिस्सा एक बार और पूरा दुख भरा हिस्सा एक बार करके सिर्फ़ दो ही हिस्सों मे भी तो बाँटा जा सकता है पूरे जीवन को. थोड़े थोड़े समय में उतार चढ़ाव आना जरुरी है? इसी बीच एक मित्र की बात याद आयी कि अगर हम इतने सही मैनेजमेंट कर सकने वाले होते/ सम्भालने वाले होते तो हम बीमार ही नहीं पड़ते ना ही उतार चढ़ाव बगैरा की फ़िक्र होती और सब कुछ सुव्यवस्थित चल रहा होता .
हर रोज की तरह आज शाम को कब्रिस्तान के सामने नसीर चाचा की चाय की दुकान पर जा बैठा. गुड वाली चाय ज्यादा पसंद है सो चाचा रोज गुड वाली चाय पिलाता है. यहा रोज एक बुड्ढे को एक आठ साल के बच्चे के साथ रोज गुजरते देखता हूँ. वह उस बच्चे को पार्क लेकर जाता है या उस वक्त लौट रहा होता है. मुझे यह जोड़ी बहुत प्यारी लगती है. पर आज वो नही दिखाई दिये मैने घड़ी मे टाइम देखा तो मै तो अपने टाइम पर था पर वो नहीं. मैने उत्सुकता से नसीर चाचा को पूछ लिया कि आज दो नही दिखाये दिये तो जबाब मिला " जनाब जिन दो की रोज तुम बात करते हो दरअसल वो कभी थे ही नहीं. सिर्फ़ आपको ही क्यू लगता है कि आप देखते उनको. " थोडा संकोचित भाव मेरे चेहरे पर था पर कुछेक मिनट बाद फ़िर से मै एक नया किरदार ढूँढ रहा था.
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