बिक जाते हैं पर्चे यहाँ, ईमान बिक जाता है,
मेहनत की स्याही पर, नोटों का साया मंडराता है।
अमीर की तिजोरी से यहाँ मुस्तकबिल तय होता है,
ग़रीब का बच्चा पढ़-लिखकर भी सड़कों पर रोता है।
सालों की वो तपस्या, वो जागी हुई रातें,
धुएँ में उड़ गईं सब, वो हक़ की बड़ी बातें।
नेताओं की कुर्सी शांत है, अफ़सर मौन बैठे हैं,
लाखों सपनों की चिता पर, वो बेफ़िक्र सोए हैं।
किताबों के पन्नों में जो इंसाफ़ पढ़ा था हमने,
वो बाज़ार के सन्नाटों में नीलाम होते देखा है।
दर्द इस बात का नहीं कि इम्तिहान रद्द हुआ,
अफ़सोस ये है कि हुक्मरानों को बेअसर देखा है।
ऐ वक़्त! गवाह रहना इस सिसकती हुई जवानी का,
ये ग़ुस्सा महज़ आँसू नहीं, आग है किसी कहानी का।
जब-जब थकेगा युवा, तब-तब ये तख़्त डोलेगा,
आज ख़ामोश है जो, कल वो इंक़लाब बोलेगा।