शनिवार, 6 जून 2026

किताबों में दबी बस्तियाँ


​वो जो छोटे से कमरे में एक रौशन दीया जलता है,

वहाँ रातों को जागकर, कोई अपना मुस्तकबिल बुनता है।

घर से दूर, अपनों से दूर, एक अनजानी सी डगर पर,

वो लड़का, वो लड़की, अपनी उम्र से पहले बड़ा होता है।

​बाज़ार की उस सूखी रोटी में माँ के हाथ का स्वाद ढूंढता है,

पॉकेट मनी के आख़िरी सौ रुपयों में पूरा हफ़्ता बुनता है।

तैयारी की इस धूप में, चेहरे की वो रौनक कहीं खो गई,

कमरे की दीवारों पर टंगे नक्शों में, वो अपना घर ढूंढता है।

​त्योहारों पर जब गाँव की ट्रेनें भर-भर कर जाती हैं,

तो बंद कमरे की खामोशी, आँखों में आँसू लाती है।

"इस बार नहीं, अगली बार आऊँगा माँ," कहकर जो फोन काटता है,

वो अपनी तन्हाई को, अलमारी की किताबों में छुपाता है।

​हर नाकामी पर दुनिया के ताने, पीठ पर गहरे घाव देते हैं,

जो खुद कभी नहीं लड़े, वो काबिलियत का हिसाब लेते हैं।

पर कोई नहीं देखता उन रातों को, जब सिरहाने भीग जाते हैं,

और सुबह फिर मुस्कुराकर, वो लाइब्रेरी की तरफ निकल जाते हैं।

​ये सिर्फ छात्र नहीं, ये एक उम्मीद हैं पूरे परिवार की,

इनकी आँखों में थकी हुई, पर ज़िंदा ज़िद है निखार की।

ऐ वक़्त! ज़रा अदब से गुज़रना इन तंग गलियों से,

इन कमरों में इतिहास छपा है, किसी की कल की जीत का। 

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