बुधवार, 5 अगस्त 2026

परेशान तेरे शहर के लोग

मेरे कारवाँ की बात और परेशान तेरे शहर के लोग,

ज़रा ऊँची उड़ान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने ख़्वाब आँखों में रखे, उन्हें गुनाह नज़र आए,

बस एक नए जहान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


उन्हें आदत है झुकी हुई गर्दनों को देखने की,

ज़रा सिर उठाकर चलने की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने सच को सच ही कहा, न कम कहा न ज़्यादा कहा,

बस साफ़ ज़ुबान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


जो ख़ुद किनारों से आगे कभी निकल न सके,

ज़रा दरिया पार की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


यहाँ हर शख़्स चाहता है कि तुम उसके हिसाब से जीओ,

ज़रा अपनी पहचान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


सच की धूप पड़ी तो कई चेहरे पिघलने लगे,

बस खुले बयान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


उनके हाथ में पत्थर थे, मेरे हाथ में हौसला था,

ज़रा इम्तिहान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने वक़्त से कहा—ठहर, अभी बहुत सफ़र बाकी है,

बस नए मुकाम की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने बस ख़्वाब क्या देखा, इल्ज़ामों का दौर चल पड़ा,

ज़रा नए आसमान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


यहाँ बौनों को डर है कहीं क़द का हिसाब न हो जाए,

ज़रा ऊँचे मकान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


मैंने दरिया पार करने की ठान ली तो शोर मच गया,

ज़रा कश्ती, तूफ़ान की बात और परेशान तेरे शहर के लोग।


'दिल जयपुरी' अभी सफ़र में है, फ़ैसला अभी न कीजिए,

कल मेरे कारवाँ की बात... और परेशान तेरे शहर के लोग।

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