#पिता
जब हमारी गाव मे पढाई पूरी हो जाती है तो अपने सपनो को उडान देने के लिए हम जयपुर या दिल्ली जैसे शहरो मे पढाई जारी करना चाहते है खासकर के हम मीणाओ के लडके लड़कियां. किसी ने कोई सपना देखा होता है किसी ने कोई सपना देखा होता है वास्तविकता मे वो सपने हमने सिर्फ देखे होते है उनको पूरा कराने का असली जुनून तो पिता की आँखों मे होता है . वो सपना पूरा करने का लक्ष्य तो पिता ने निश्चित किया होता है हमसे ज्यादा. और एक मध्यम वर्गीय या गरीब परिवार मीणाओ के है ज्यादातर. सभी मीणाओ के घर मे कस्टम कलेक्टर आईपीएस नही है . है भी तो वो भी ऐसी ही स्थिति से गुजरे है . बात ये है कि जब हम पढाई जारी करते है शहर मे तो कमरा कॉलेज और कोचिंग की फीस पिता देता है और हमको ये पता नही होता कि उसने कहा से रुपयो की व्यवस्था की है . हमारा पिता ये नही चाहता कि हमको इन सब का पता चले क्यूकी वो सोचते है कि ये बात हमको मायने नही रखती , हमे सिर्फ पढाई ही मायने रखनी चाहिये. कोचिंग नही छूटती कभी मैथ की तो कभी इंग्लिश की ...तो कभी रीजनिंग की तो कभी साइंस की .....कभी रेल्वे के लिए तो कभी बैंक के लिए ..तो कभी एस एस सी के लिए. सबका कोर्स अलग अलग . कुछ लडके हर कम्पीटिशन की परीक्षा के लिए हर बार कोचिंग करते है . फीस 6000 से 25000/30000 पर हमको पता नही है पैसा कहा से आ रहा है . हमने तो बस पापा को बोला था . पापा कमरा का किराया देना है पापा मैथ की कोचिंग की फीस देनी है पापा खर्चा को पैसे खत्म होगे पापा पापा पापा...Always. और पापा के शब्द...बेटे कितने चाहिए. बेटा कहेगा 10000 बस. पापा कहेगा परसों डला दुंगा तो चलेगा . बेटा कहेगा पापा कल कोचिंग मे बैठने नही देगा टीचर. ठीक है बेटा दोपहर तक डला दुंगा. दोपहर को फिस जमा हो जायेगी बेटे की अब बिना टेंशन के पढाई जारी रख सकेगा.
कुछ वर्षो बाद जब बेटा कलेक्टर/कस्टम/जेइन/फईन/मास्टर/गैंगमेन/चपरासी कुछ भी बन जायेगा. पिता को लगेगा मेरा तो जीवन सफल हो गया . गाव मे मूंछो में ताव देकर घूमता है अब पिता क्यूकी उसको बेटे से जो उम्मीद थी पूरी कर दी .
इन मूंछो के ताव को देखकर एक दिन जब बोहरा घर आता है कि ला अब तो गढ तोड दिया तेरे छोरे ने भाई म्हारा भी हिसाब कर लें . तब पिता कहता है कि हा भाई आओ कर लेते है बहुत शुक्रिया जो तुमने मेरा साथ दिया . हिसाब मे पता चलता है कर्जा 4 लाख/5 लाख/ 6 लाख /8 लाख जुडता है . बेटे को कहा जाता है कि बेटा पैसा देना है दूसरे का और बेटा के शब्द होते है - कौनसा पैसा . मैने तो अकेले खर्च नही किये पूरे. मै तो बस कुछेक लाख एडजस्ट कर सकता हूं खींच के .बाकी आप देख लो . ये शब्द सुनकर बाप दिल बै़ठ जाता है . वो नि:शब्द हो जाता है .
अब उस कलेक्टर साब को क्या पता कि जो पैसे उसे भेजे जाते थे वो घर मे पेड से नही तोडे जाते थे. खेती मे इतना भी नही होता कि खाद बीज का खर्च चल सके . उसकी बीमार मां को जिन्दा भी तो आजकल की अंग्रेज़ी दवाईयो ने रखा है जो कितनी महंगी होती है उसे पता नही. उस बेटे को ये भी पता नही कि उसके छोटे भाई बहन को भी तो पढाया जा रहा है जिनका खर्च देने के लिए सडक पर कोई दान पेटी नही है . शायद उस बेटे को ये भी पता नही होगा कि 1 लाख रूपये का 3 साल मे 2 लाख हो जाता है जो कि 2 रूपिया प्रति सैकडा है तो वरना कुछ तो इससे भी ज्यादा मे बोहरगित करते है . और उसे शहर मे शानदार वक्त बिताते 5-8 साल हो जाते है . वो भूल जाता है वो महंगे महंगे कपडे वो शानदार एक हाथ लम्बा मोबाईल. परिवार की हर जरूरत पूरी की थी जितना कमा सकता था उससे घर का खर्च चला लेता था. और क्या बताऊँ अब यार सब कुछ तो कह दिया.....
दुनिया मे पिता से बढा सलाहाकार; मार्गदर्शक; साथी; हर्षवर्धन करने वाला कोई नही होता ।
जिनके सर पर पिता का साया है वो भाग्यशाली है जिनके पर नही है उनको कामयाब व्यक्ति बनकर सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते है.
एक बात सीखी है जिंदगी मे ...कुछ भी करूगा पर ऐसा कुछ नही करूंगा जिससे पिता के दिल को ठेस पहुंचे. और गर्व है अब तक तो ऐसा नहीं किया.
और मै सिर्फ आज याद नही कर रहा रोज पिता को याद करता हूं . आज तो #असलियत लिखी है कुछ लोगो की .
उनको समर्पित है जिनके घर मे मूंसे ग्यारस कर रहे है और शहर मे R15 के पीछे भायेली बैठकर घूम री है ।
जब हमारी गाव मे पढाई पूरी हो जाती है तो अपने सपनो को उडान देने के लिए हम जयपुर या दिल्ली जैसे शहरो मे पढाई जारी करना चाहते है खासकर के हम मीणाओ के लडके लड़कियां. किसी ने कोई सपना देखा होता है किसी ने कोई सपना देखा होता है वास्तविकता मे वो सपने हमने सिर्फ देखे होते है उनको पूरा कराने का असली जुनून तो पिता की आँखों मे होता है . वो सपना पूरा करने का लक्ष्य तो पिता ने निश्चित किया होता है हमसे ज्यादा. और एक मध्यम वर्गीय या गरीब परिवार मीणाओ के है ज्यादातर. सभी मीणाओ के घर मे कस्टम कलेक्टर आईपीएस नही है . है भी तो वो भी ऐसी ही स्थिति से गुजरे है . बात ये है कि जब हम पढाई जारी करते है शहर मे तो कमरा कॉलेज और कोचिंग की फीस पिता देता है और हमको ये पता नही होता कि उसने कहा से रुपयो की व्यवस्था की है . हमारा पिता ये नही चाहता कि हमको इन सब का पता चले क्यूकी वो सोचते है कि ये बात हमको मायने नही रखती , हमे सिर्फ पढाई ही मायने रखनी चाहिये. कोचिंग नही छूटती कभी मैथ की तो कभी इंग्लिश की ...तो कभी रीजनिंग की तो कभी साइंस की .....कभी रेल्वे के लिए तो कभी बैंक के लिए ..तो कभी एस एस सी के लिए. सबका कोर्स अलग अलग . कुछ लडके हर कम्पीटिशन की परीक्षा के लिए हर बार कोचिंग करते है . फीस 6000 से 25000/30000 पर हमको पता नही है पैसा कहा से आ रहा है . हमने तो बस पापा को बोला था . पापा कमरा का किराया देना है पापा मैथ की कोचिंग की फीस देनी है पापा खर्चा को पैसे खत्म होगे पापा पापा पापा...Always. और पापा के शब्द...बेटे कितने चाहिए. बेटा कहेगा 10000 बस. पापा कहेगा परसों डला दुंगा तो चलेगा . बेटा कहेगा पापा कल कोचिंग मे बैठने नही देगा टीचर. ठीक है बेटा दोपहर तक डला दुंगा. दोपहर को फिस जमा हो जायेगी बेटे की अब बिना टेंशन के पढाई जारी रख सकेगा.
कुछ वर्षो बाद जब बेटा कलेक्टर/कस्टम/जेइन/फईन/मास्टर/गैंगमेन/चपरासी कुछ भी बन जायेगा. पिता को लगेगा मेरा तो जीवन सफल हो गया . गाव मे मूंछो में ताव देकर घूमता है अब पिता क्यूकी उसको बेटे से जो उम्मीद थी पूरी कर दी .
इन मूंछो के ताव को देखकर एक दिन जब बोहरा घर आता है कि ला अब तो गढ तोड दिया तेरे छोरे ने भाई म्हारा भी हिसाब कर लें . तब पिता कहता है कि हा भाई आओ कर लेते है बहुत शुक्रिया जो तुमने मेरा साथ दिया . हिसाब मे पता चलता है कर्जा 4 लाख/5 लाख/ 6 लाख /8 लाख जुडता है . बेटे को कहा जाता है कि बेटा पैसा देना है दूसरे का और बेटा के शब्द होते है - कौनसा पैसा . मैने तो अकेले खर्च नही किये पूरे. मै तो बस कुछेक लाख एडजस्ट कर सकता हूं खींच के .बाकी आप देख लो . ये शब्द सुनकर बाप दिल बै़ठ जाता है . वो नि:शब्द हो जाता है .
अब उस कलेक्टर साब को क्या पता कि जो पैसे उसे भेजे जाते थे वो घर मे पेड से नही तोडे जाते थे. खेती मे इतना भी नही होता कि खाद बीज का खर्च चल सके . उसकी बीमार मां को जिन्दा भी तो आजकल की अंग्रेज़ी दवाईयो ने रखा है जो कितनी महंगी होती है उसे पता नही. उस बेटे को ये भी पता नही कि उसके छोटे भाई बहन को भी तो पढाया जा रहा है जिनका खर्च देने के लिए सडक पर कोई दान पेटी नही है . शायद उस बेटे को ये भी पता नही होगा कि 1 लाख रूपये का 3 साल मे 2 लाख हो जाता है जो कि 2 रूपिया प्रति सैकडा है तो वरना कुछ तो इससे भी ज्यादा मे बोहरगित करते है . और उसे शहर मे शानदार वक्त बिताते 5-8 साल हो जाते है . वो भूल जाता है वो महंगे महंगे कपडे वो शानदार एक हाथ लम्बा मोबाईल. परिवार की हर जरूरत पूरी की थी जितना कमा सकता था उससे घर का खर्च चला लेता था. और क्या बताऊँ अब यार सब कुछ तो कह दिया.....
दुनिया मे पिता से बढा सलाहाकार; मार्गदर्शक; साथी; हर्षवर्धन करने वाला कोई नही होता ।
जिनके सर पर पिता का साया है वो भाग्यशाली है जिनके पर नही है उनको कामयाब व्यक्ति बनकर सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते है.
एक बात सीखी है जिंदगी मे ...कुछ भी करूगा पर ऐसा कुछ नही करूंगा जिससे पिता के दिल को ठेस पहुंचे. और गर्व है अब तक तो ऐसा नहीं किया.
और मै सिर्फ आज याद नही कर रहा रोज पिता को याद करता हूं . आज तो #असलियत लिखी है कुछ लोगो की .
उनको समर्पित है जिनके घर मे मूंसे ग्यारस कर रहे है और शहर मे R15 के पीछे भायेली बैठकर घूम री है ।
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