बुधवार, 29 जनवरी 2020

सर्दियों की अलाव

ढलती ठिठुराती साँझ
बाबा को अघाना जलाता छोटा भाई
घर के बाकी का भी आग जलती देख आ बैठना
हर शाम  अघाने के घेराव मे बीतने का दृश्य
कभी उसकी ठिठोली कभी मेरा मजाक
कभी कडव की पूणी जलाना
जिसपे अदरक वाली चाय देने आयी माँ का डाँटना
वो स्वेटर की छीना झपटी
फ़िर बाबा की कम्बल मे दुबकना
और बापू के भूतो वाले किस्से
जलती लकड़ी पे आग का इतराना
ये सोचकर कि कितने करीब है सब
तभी अचक से किसी का ठंडा हाथ
किसी के गालो पे चिपकाने से झगड़ना
और...
और उसपे मां का खाना खाने को आवाज लगाना
मेरा बापू और बाबा के साथ बैठे बैठे अघाने पर ही खाना
उस पर फ़िर मां के तानो मे मुस्कुराते बापू की हिस्सेदारी
देर रात जब तक बुझ न जाये आग सेंकना

जीवन तो वही था...
खूबसूरत बचपन ही था...

#दिल_जयपुरी

कही तो हमारा मिलना होता

कही तो हमारा मिलना होता
किसी कहानी मे ही सही ...
पर मै भी आज तक एसी कोई कहानी भी नही लिख पाया जिसमे मिलना तय हो. हर जगह बिछडना क्यू लिख देता हूँ खुद पता नही. कोशिश करुन्गा यदी आगे कोई प्रेम पर कुछ थोड़ा बहुत लिख पाया तो. भावनाये लिख कर ही सही काल्पनिक तौर पर ही सही पर एकबारगी तो महसूस कर सकून्गा वो सब जो असल मे नही कर पाया कभी. जो मै करना चाहता था जैसा मै जीना चाह रहा था जैसा मै साथ रहने का ख्वाब पाले हुये था वैसा सब ...अब बस कहानियों मे ही जी सकता हू.
जीवन का कोई भी हिस्सा हम दुबारा नही जी सकते बिल्कुल गुजरे वक्त के माफ़िक वापिस नही आता कुछ भी. जैसे बचपन को दुबारा जीना हो तो यादो के सहारे हम बस महसूस कर सकते है. कोई बेहद दिल के करीब किस्सा हमारे साथ उसी तरह हो जिस तरह पहले हुआ था इत्तेफाक होगा और इत्तेफाक जीवन मे कम ही होते है. इक उम्र होती है जब इंसान प्यार मे जी रहा होता है वह जिन्दगीभर उसी मे जीना चाहता है. वह चाहता है आज जो सब उसके पास है वह आजीवन रहे पर अक्सर ही होता है एसा कुछेक भाग्यशाली लोगो के साथ वरन ज्यादातर के साथ उसके जीवन के सुखद पल छीन लिये जाते है. प्रकृति का नियम थोडा अटपटा लगता है तब कि हम जो चाहते हैं वह होता क्यू नहीं है जिन्दगीभर हमे संघर्ष क्यू करना पड़ता है क्या आराम की जिन्दगी जीना गुनाह है और आराम का मतलब यहा सिर्फ़ इतना सा है कि जिसके साथ जीने का मन हो उसके साथ ही बाकी की जिन्दगी निकले बस. दिल का खुश रहना उसके संतुष्ट रहने के बिल्कुल समानुपातिक होता है. मन उतना ही साफ़ और स्वस्थ रहता है जितना वो संतुष्ट रहता है.

#दिल_जयपुरी

जिंदगी में सब जुंआ है

जिन्दगी मे...

हर सांस जुंआ है...
हर सुबह जुंआ है... हर रात के बाद
हर दूसरी धड़कन जुंआ है...  पहली धड़कन के बाद

किसको पता है

सांस कौनसी आखिरी होगी ...
कौनसी रात आखिरी होगी ...
कौनसी धड़कन के बाद ... दिल दुबारा नही धड़केगा

ये सब
जुंआ ही तो है ...

एक एसा खेल जिसे खेलते हम नही है ,
       पर हार जीत हमारी ही होती है.

खुद को देखना छोड़ दो... तो दुनिया बच जाती है...
और  दुनिया को देखता है तो खुद अधूरा रह जाता है इंसान...

#जिन्दगी_के_बड़े_रगड़े_है_जी

#दिल_जयपुरी

आसमां भर दुनिया...

जितना आसमां हम देख सकते है
हमारी दुनिया उससे ज्यादा नही हो सकती
 जितने तारे आसमां मे है शायद वो सब जिद्दी होंगे इसीलिये सितारे बन गये और जमीं के अधूरेपन को महसूस करते होंगे.
जो जिद्दी नही होते वो कुछ खास कर नही पाते है आजीवन. जिद इंसान को आसमां बडा देखना सिखाती है.

ये दुनिया जितनी छोटी समझते हो असल मे उतनी है नही और जितना बडा तुम कालचक्र को समझते हो वो असल मे उससे भी बडा है.

आसमां के सितारे (जितने हम देख सकते है) और जमीं के पागल ( जिद्दी )इंसान एक दूसरे की तुलना मे काफ़ी लगते है पर जमीं पर कम ही मिलेंगे नगण्य भी कह सकते हो क्यूकी पागल कोई बनना ही नही चाहता.
पागल बनने का एक फ़ायदा है, वह दूसरो को है कि वो किसी से शिकायत नही करता बल्कि बड़ी से बड़ी समस्याओं का तोड़ उसके पास होता है जिनसे धरा के नियम भी बदलने जैसे आव्रति होती है.

पिछली रात एसे ही मन मे ख्याल आया  कि  अगर खुद सितारा होता तो क्या होता या कहा होता या क्यू होता...  मै बालकनी से सप्तऋषि मंडल कहे जाने वाले तारो के झुंड को देख रहा था ( जो कि एक प्रश्नवाचक चिह्न की आकृति के भाँति दिखता है. बचपन मे मां ने बताया था कि आसमां की सबसे खूबसूरत जगह यह है) तो मैने खुद को वहा होना पाया. क्यूकि मुझे भी आसमां का यह हिस्सा बचपन से पसंद है.

#दिल_जयपुरी

At मरीना बीच

#मरीना_बीच_चेन्नई

- बची हुई गुल्ली(मक्का)  को कौअा खा रहा है देखो
- श्मशान घाट मे भी अपने हिस्से का चावल नही छोड़ते ये.

- मतलब
- कुछ नही

- अवे पानी मे इतना अंदर क्यू जा रहा है.  मरेगा क्या . समंदर है ये वहा ले जायेगा.
- वहा तक गहरा ज्यादा नही है. भीग लेने दो थोडा. वैसे भी एक दिन सबको मरना है.  और मरने के बाद body बाहर फ़ेन्क देता है समंदर पता है ना.

- तेरी मम्मा कैसी है अब उनकी तबीयत खराब थी ना.
- पता नहीं. चार पांच दिन से बात नही की.

- पता तो होगा.
- छोटा भाई है उसके पास.  सो कोई टेन्शन नही है.

- क्यू
- वो लापरवाह नही है. और एक दिन तुम भी मै भी वो बच्चे भी और वो बूढा वहा जो अपनी पोती के साथ खेल रहा है सब को ये दुनिया छोडनी ही है.

- तु पगला गया है क्या.  हर बात पे  मरना कहा से आ जाता है बीच मे.
- क्यू इसमे क्या गलत था.

- सही गलत मत सिखा.  उम्मीद होती है जीने की बस.  और उसी पे दुनिया चल रही है.
- उम्मीद...  जिन्दा लोगो को मारती है. अगले पल का भरोसा नही.  उम्मीद क्यू पालते है लोग पता नही.

- तू ना किसी अच्छे साईक्लोजिस्ट को दिखा. तेरा दिमाग ठीक नही है.
- अरे एसा कुछ नही है.  बस मै सच को दिल से कुबूल करता हू.  मुझे फ़र्क नही पड़ता किसी भी चीज से  . जीना मरना, दुख सुख,  जुड़ना बिछडना.  सबकुछ मेरे लिये एक समान जिन्दगी के हिस्से लगते है.  जो कि है भी. पर सब डरते है इसे मानने से जबकी सबके मन को पता है सच्चाई.

- तुझे नही लग रहा ये ज्यादा हो रहा है. ना जगह देखता ना वक्त देखता ना कुछ और बस जो मन मे आया बक दिया.
- हा चलो अब रात हो जायेगी घर पहुचते पहुचते....

#दिल_जयपुरी

अधूरापन

कुछ चेहरे होते है जिन्हें हम ता-उम्र नहीं भूल पाते कुछ होते हैं जिनको भूलना नहीं चाहते. एक होते है दर्द बांटने वाले एक होते है बांटने की आड़ मे बढ़ाने वाले. बढ़ाने वाले ज्यादा मिलते है. धीमा जहर भी कह्ते है कुछ लोग जिसे. दूसरी तरह के लोगों का जीवन मे कोई खास मकसद नहीं होता सिवाय इसके कि उनको आनंद समय पर मिलता रहे जिसके लिए हर बात को मसालेदार बनाना जरूरी होता है. ताकि सुनने वालों के कान मे रेंगती जुआ जरा रफ़्तार बढ़ाए अपनी.
बात ये है कि यदि हम दूसरे प्रकार का जीवन जीते है तो इस बात से मुकर नहीं सकते कि जिंदगी लूजर के जैसे काटने से ज्यादा कुछ नहीं है. जिनके खुद के जीवन मे रोशनी नहीं होती वो दूसरों के घरों का दिया बुझाने मे माहिर होते है. ये दूसरी तरह के होते है. किसी की सोच को बदल पाना जितना मुश्किल है उतना ही आसान है वह खुद को समझ पाये. जो कि अक्सर होता नहीं है क्युकी हर आदमी अपनी नजर मे सही है. अपनी नजर मे सही होना भी एक स्तर तक ही सही होता है उससे उपर यदि कुछ आता है तो उसे अमूमन गलतफ़हमी कह्ते है. मानसिक बीमारियो की वज़ह भी गलतफहमियां बनती है. इसी तरह की बीमारियो के पीड़ित होती है बलात्कारी किस्म की सोच. हर व्यक्ति के अंदर बुराई और अच्छाई युद्धरत होती है एसा सुना होगा पर य़ह सच है. कुछ होते हैं जो काबू पा लेते है कुछ होते है जिनकी बुराई से दूसरे लोग प्रभावित होते है...

इससे आगे तुम सोचिए कुछ अधूरा लिखने का मन है. अंत मे अधूरापन छोड़ने का मन है.

दिल जयपुरी

दिल का 2

#दिल_का
ये बिज़ली के तार कहा तक जाते होंगे. य़ह बिज़ली आती कहा से है. पत्थर कभी खत्म नहीं होगा क्या इस धरती से क्युकी ये तो बनता नहीं है मशीन से. बचपन मे एसे ही अनगिनत सवालों के साथ एक मुस्कान उसे देखकर भी आती थी कि आगन के उधर वाले कोने से और काकी के घर के ठीक उपर से रोज देर शाम को एक चीलगाड़ी गुजरती है जो अपने पीछे एक लम्बा सा धुआं का रास्ता छोड़ती जाती है जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि बहुत दूर से आयी होगी सच मे य़ह. बिन वजह के हमेशा मुस्कान बिखेरे होंठ. पेप्सी के ढक्कन की फिरकी भी बनाने का अलग ही लेवल का अनुभव रहा है. खिलौने भी तो सिर्फ वो ही होते थे ना जिन्हें हमने या मम्मा ने हाथ से बनाया हो मिट्टी या लकड़ी के खिलौने. मैं गत्ते की गाड़ी बहुत अच्छी बनाता था और फिर उसे देखकर मेरा छोटा भाई जलता था फिर वो ट्रिक उसने मेरी गाड़ी देखकर ही सीख ली और उसने भी ठीक वैसी की वैसी चार पहियों वालीं गत्ते की गाड़ी बना दी. मैंने भी सबकी तरह बाबा और बाऊ से बहुत किस्से कहानिया सुनी है जो अब तक मुझे याद है.
मै हमेशा से आजाद ख़यालात वाला रहा हू. मैंने अपने विचारो को बांधकर नहीं रखा कभी ना बचपन मे ना अब. बचपन मे एसे ही विचारो की वज़ह से खूब बापू के हाथो ने इज़्ज़त बरसाई है पीठ पर. अब जब ना कोई लड़ने वाला है ना कोई रोकने वाला है ना कुछ एसा की किसी से मांगना पड़े पर सब अधूरा रह जाने का सा लगता है. सब कुछ पीछे छूट  जाने सा लगता है. अब जिंदगी एक समस्या से सुलझते उलझते गुजरे जा रहीं है.
 सरकारी नौकरी लग जाती है पर उसके एक समय बाद लगता है कि सच मे गुब्बारे मे रखा रसगुल्ला चूस रहे है हम. एक नजरिये से देखा जाए तो अच्छा जीवन उसी का रह गया है जिसके पास सरकारी रोजगार है दूसरे की नजर मे परंतु जहा तक मैं सोचता हू तो सरकारी नौकर का मानना होता है कि वो ये बनने के बाद वह किसी भी प्रकार की समस्या नहीं चाहता जीवन मे किसी भी प्रकार का संघर्ष वो नहीं कर पाएगा इसीलिए उसे नौकरी की जरूरत है. वह सिर्फ उतना ही करना चाहता है जितना उससे कहा जाता है. सबका अपना नजरिया है खैर. मेरा नजरिया नकारात्मक और सवालात वाला है थोड़ा पर उसका मुझे कोई अफसोस नहीं है बल्कि मैं भी सरकारी नौकर हू.

सांसे रुक जाती है वक्त नहीं रुकता. उम्र निकल जाती है डील डल हो जाता है. पैदा होने से रोजगार पाने से ठीक पहले तक का वक़्त सबका अपना वक्त होता है जो उसने अपने लिए दिया होता है. जिसमें अपनी तरह का थोड़ा जिया होता है. उसके बाद आजीवन खुद के लिए वक़्त नहीं होता इंसान के पास. मुझे पता नहीं है आज कहना क्या चाहता हू पर मन मे एसे ही कुछ चल रहा है जिससे खुद अनभिज्ञ हू फ़िलहाल मैं.

#दिल_जयपुरी

बिकते पर्चे, सिसकते ख़्वाब

​बिक जाते हैं पर्चे यहाँ, ईमान बिक जाता है, मेहनत की स्याही पर, नोटों का साया मंडराता है। अमीर की तिजोरी से यहाँ मुस्तकबिल तय होता है, ग़रीब...