रविवार, 1 सितंबर 2019

तुम्हारे बाद D

#ashtag_तुम्हारे_बाद
                                                       खिड़की वापस लगा दी और पर्दा भी ताकि कोई मेरा अकेलापन ना देख सके । ये लम्बा अशोक का पेड़ भी । बारिश रुकी नही है पर धीमी पड़ चुकी है मै कॉफ़ी बनाने किचन मे चला आया ।  हल्की बारिश होती तो बाहर जाता पीने , पास मे ही एक कॉफ़ी कैफ़े है पर ये औसत से थोड़ी ज्यादा है ।  तुम्हारे बिना अब छोटी छोटी चीजो  में खुशी ढूँढना आदत सी हो गयी है जैसे मद्रास में शाम की इस ठंडी हवा का अलग ही अहसास है । जैसे बचपन मे बारिश मे भीगने के बहाने ढूँढते थे जैसे कि बनिये की दुकान से फ़लाँ सामान लाना है बगैरा । अब लगता है कि भीग गये तो ठंड लग जायेगी , बीमार हो जाएंगे या कपड़े खराब हो जाएंगे जैसे बेमतलबी से बहाने जिनके पीछे जिन्दगी है । एक खुशनुमा जिन्दगी । जो तुम्हारे साथ थी बिल्कुल वैसी ही खुशनुमा जिन्दगी । जहा बस हम होते है और हमारा बचपना जो शायद अब नही रहा । इंसान के पूरे जीवन मे सिर्फ़ बचपन ही आनंदमय होता है बाकी उम्र जिम्मेदारीयो से भरी,  डर से भरी एसी ही कई सारी चीजो के बीच से गुजरती है । हमेशा की तरह कॉफ़ी टेबल पर रखी और एक गिलास पानी पिया जो की मेरी आदत है । पिताजी कहते है चाय या कॉफ़ी से पहले एक गिलास पानी पियो तो वो नुकसान नही करती । अब इसमे सच्चाई कितनी है पता नही .

तुम्हारे बाद C

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                                            आज फ़िर वो ही पसंदीदा गाना मेरा पीछा छोडने का नाम नहीं ले रहा है जबकि मुझे भली भाँति समझ है उस गुजरे वक्त की जो कभी मेरा हुआ करता  था  पर आज  वो  ही  मेरा नही है । समय का सारा घेराव मै  अच्छे से  समझता हूँ ।  मेरा दिल भी । परंतु    हम सब इंसान है जीव है और जीवो मे भावनाए होना प्राकृतिक है । समझ कोई आढे नही आती या कम आती है । इन गीली आँखो से वर्षो से आजीवन के लिये संजोये सपने बिखरते हुये जब चाहे वह निकलते है जैसे टूटकर भी मेरे नहीं होना चाहते ।

                                               कभी कभी सोचता हूं क्या वो भी उतनी ही सांसे लेती होगी जितनी की मै ! क्या उसकी भी आँखो से बहने वाले खारे दरिया मे कभी ना खत्म होने वाला पानी होगा जितना मेरी मे है !  या थोडा सा कम या थोडा सा ज्यादा । या फ़िर जितना मै सोचता हू उतना वो नहीं सोचती ।   " आँखो पर बड़े बड़े काले घेरे हो गये है आपके " कई लोग कह चुके है पिछले कुछ दिनो मे  । पर मै तो पूरे सात से आठ घंटे सो रहा हूँ । शायद एसे ही पड़ रहे होंगे । उम्र का एक पड़ाव पूरा हो चुका है शायद इसलिये भी ।  मुझे फ़र्क नही पड़ता कोई कुछ भी कहे कुछ भी सोचे या कोई अपनी जिंदगी से ही क्यू ना निकाल दे भले । हा हू केयरलेस, नही  कर सकता मै । मै उतना अच्छा लड़का नही हू जितना कुछ लोग समझते हैं ।

तुम्हारे बाद B

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                        कुछ दिनो से लग रहा है कि अब ज्यादा वक्त नही बचा है । जो मै हू नही वो ही बनता जा रहा हू । पलभर के लिये  लगता है  कि बस  ये ही  पल आखिरी  है फ़िर  कुछ ही सैकंड बाद ख्याल आता है पलभर का ही तो खेल है इस जहां मे । सारी दुनिया पल पल जीती हुई वर्षो जी जाती है और नही तो आज की रात नही गुजरे । यही विधान है ।  पर मुझमे अब जीने  की  चाह भी नही  बची है ।  बचेगी भी कैसे । जब  हम अपने जीवन की सबसे प्यारी चीज के साथ नही जी सकते तो क्यू जीना चाहेंगे ।

                       रात का तीसरा पहर बीतने को है और मेरे अंदर अब कुछ बचा नही है, सब रीत गया हू मै,  गहराई तक । मुझे पता है कि ना मेरा कोई कल था और ना ही कोई कल होगा । मेरे पास है तो बस आज ।  जिसमे भी अभी के कुछ पल । एक वक्त होता है जब हमे हमारी जिम्मेदारीयो भरी जिंदगी नही दिखती । एसे विचार आते ही नही मन मे कि अभी कुछ करना भी है जीवन मे ।

तुम्हारे बाद A

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                        मै हमेशा से ही उसके पास रहना चाहता था ।  मेरा दिल कभी उसे छोड़कर जाने को राजी नही हुआ और ना ही कभी मेरे हाथो ने उसके हाथो को छोड़ना चाहा । नींद मे भी अपने होंठों को उसका नाम बुदबुदाते अक्सर पकड़ा है मैने । उसका नाम कई दफ़ा पुकार लेने की रिश्वत मांगी है मुझसे इन अंधेरी रातो ने नींद भेजने के बहाने ।
                      हर वो सुबह जो इस जहां मे खुदा की ईबादत से शुरू होती है , मेरे लिये उसका जिक्र किये बिना कभी नही हुई । आज भी हर शाम मुझसे शिकायत करती है कि शायद मै अभी तक खुद के लिये नही जी पाया हू । वास्तव मे..??...  पता नहीं!
                       मेरे कमरे के दरीचे से झाँकता ये अशोक का लम्बा पेड़ मेरी पल पल की बेचैनी का गवाह रहा है । इसने मुझे दिन मे उसका नाम चिल्लाते देखा है तो रात को बालकनी मे भटकते भी,  उसकी यादो की वजह से औझल नींद के कारण । पर इसने मेरे हालात समझे है सो चुप रहता है या इसे तरस आता है मेरी हालत पर । पता नहीं क्या है ।

शुक्रवार, 17 मई 2019

मद्रास डायरी 5

मद्रास डायरी 5

ये पांचवा दिन था. आज वो दिखाई नहीं दे रही . मेरी नजरे बस उसी पर टिकना चाह रही थी पर उसकी नामौजूदगी मे टिक नही पा रही थी.  कोच मे कभी इस तरफ़ तो कभी उस तरफ़ देखें जा रहा था बेकार में. धूप भी ठीक से नही खुली आज शायद बारिश आयेगी दोपहर तक. घने काले बादलो से लग रहा था कि मौसम ज्यादा ही खराब होने वाला है .   मन अशांत सा है. अनकहे से कई अरमान दिल मे थे और न जाने कब से जो सब आज उसके साथ शेयर करने वाला था. सब तरफ़ निगाह फ़ेरने के बाद कन्फ़र्म हो गया था कि आज वो नही आयी है.  मेरे डेली रुटीन मे आज उसकी कमी थी . पर उसकी कई साथी आयी है सिर्फ़ वो ही नही एसा क्यू.  मन मे ख्याल आ रहा था शायद खराब मौसम की वजह से नही है पर दूसरा ख्याल कहता तो फ़िर ये सब कैसे आ गयी वैसे भी  मौसम इतना भी खराब नही है.  कही सौ ख्वाव देखे थे सब का कोई अता पता नही . तभी उसकी एक साथी ने आवाज लगायी... 
क्या आप ही रिन्कू हो ??
हा!  पर...!!!
वो अब नही आयेगी. 
पर क्यू? 
उसने दूसरी कम्पनी जोईन कर ली बैंगलोर मे आज से.  शैटरडे को निकल गयी थी वही शिफ़्ट हो गयी है वो अब. 
तो आपको कैसे पता हमारे बारे मे ??
उसने मुझे बता रखा था पहले दिन से ही. 
कल कोल किया था तो बोल रही थी अगर आप मिलो तो एक बार बता दू.

इस छोटे से कन्वरसेशन मे सब खत्म हो गया था. लग रहा था बडा ख्वाव अधूरा रह गया. मन बैचैन पहले से ही था अब तो मानो टूट सा गया.  कुछेक पल की बातो से इतना लगाव. दरअसल लगाव तो पहले ही था बात अब हुई थी. उसकी हर बात रह रह के याद आ रही थी.  उसके पास होने जैसा महसूस तो नहीं हो रहा था पर कुछ तो था जो थोडा लग रहा था कि यही आस पास ही है.

आपका नम्बर दे सकते हो?  उसकी सहेली ने अचानक से कहा. 
आपको??
नही!  वो मांग रही थी. आपसे बात करना चाहती है. शाम को बात करूंगी तब दे दुन्गी. 
ओह. !
हा. उसका घर यही है. पर वहा पैकेज अच्छा मिलने के कारण चली गयी है.  " उसने कहा

 मेरे अंदर की उदासीनता लम्बी मुस्कान मे बदल गयी थी. इतनी सी देर मे पता नही क्या क्या सोच लिया था. किसी को दिल से चाहते है तो वो जरुर मिलता है ये बात शायद सच निकली. हल्की बारिश के साथ मौसम खुशनुमा हो रहा था.  मै उतर कर office आ गया था.

मद्रास डायरी 4

#मद्रास_डायरी 4

शाम के छ: बजे है. थोड़ी तेज अदरक और शक्कर वाली चाय की चुस्की के साथ थडी पे बैठे बैठे सड़क पर आते जाते वाहनो का मुआयना करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा सा है. अक्सर अकेला होता हू. रोज की तरह गुजरती बड़ी छोटी गाडियों की कम्पनियो के नाम पढ़ रहा हू . चाय एकदम बढिया बनाता है अन्ना.  आज ही बोल रहा था इसको कि अन्ना तन्दूरी टी स्टार्ट करो अब ज्यादा कमाई होगी और आसपास है भी नही दूर तक. मैने कभी पीयी नही पर बनने के तरीके से कह सकता हू कि शानदार होगी टी लवर्स के लिये.  तभी एक स्कोडा सामने से निकली और बगल के रिलायन्स फ़्रेश के आगे रूकी.
    ड्राइवर सीट से एक लडकी उतरी. क्रीमी शर्ट और डेनिम के साथ चार इन्च उचे सफ़ेद नाईकी स्नीकर पहने  गालो पे झूलते बालो को कान पे सरकाती हुई खच्च से गेट को लगाया और अंदर जा ही रही थी कि मैने पहचान लिया अरे ये तो वो ही है जो रोज ट्रेन में मिलती है. पर यहा कैसे. दो चार बची घूट जल्दी खत्म कर चाय का गिलास रखा और अन्ना के मुह पे कागज का दस का नोट मारा . मै भी अंदर गया. वह सब्जीया देखने लगी और मै पीछे वाली गैराज से होता हुआ उसी के सामने आ गया भुजिया का बडा पैकेट हाथ मे लिये ताकी उसे मात्र संयोग वाली फ़ीलिन्ग आये.

फ़ीलिन्ग लाईक...
#उनसे_नजरे_क्या_मिली_रोशन_फ़िजाये_हो_गयी

"ओह... आप यहा कैसे ! "मैने पूछा .
"अरे.. आप  ? हा यही थोड़ी दूर ही तो रहते है हम.  पर आप यहा कैसे.? आप तो विल्लीवक्कम रहते हो. "
"हा!  पर हम यहा चाय पीने इसी दुकान पे आता हू  और सामान लेने भी यही  "
"पहले कभी नही दिखे ."
"आज देख लिया ना.  "
" हा पर... " इतने मे लम्बी ट्यून के साथ कुछ लीरिक्स सुनाई दिये

मेरा नाम इश्क ...तेरा नाम इश्क ...
ये #लाल_इश्क ...ये मलाल इश्क ...

मेरा हाथ अपने आप मोबाईल तक गया और अलार्म बंद कर दी.  सुबह के छः बजे थे.
ओ हो... यहा भी #अधुरा_लाल_इश्क

मद्रास डायरी 3

#मद्रास_डायरी 3

                      स्टेशन पर उतरते ही मै सीधे ओफ़िस गया. मन मे वो ही चल रही थी स्वभाविक है इतने दिनो से अपने क्रश को मै सिर्फ़ देखता था और आज अचानक से उसने माहौल एसा बनाया कि मै खुद को बात करने से रौक नही पाया. लड़की एसी ही होती है.  उनको अगर किसी से बात करनी है तो वो खुद माहौल एसा बनाती है कि लड़का अपने आप बात करने लगता है जब दूर रहना चाहती है तो उनके मन मे ख्याल तो क्या सामने खड़े आदमी की शक्ल भी नही दिखेगी कि है कौन सामने. लड़कियो को हर पल मिलने वाले लोग पता नहीं रहते लड़को को हर पल दिखने वाली हर लड़की कितने ही दिनो तक याद रह सकती है .अब इसे प्रकृति का नियम कहो या कुछ और.
                  " केदार,  अदरक वाली चाय लेके आओ सबके लिये ओफ़िस मे.  '  मैने ओफ़िस मे एक कर्मचारी को कहा जिसका काम सिर्फ़ चाय लाना ही है. अक्सर ओफ़िस आते ही चाय के लिये जाता है सो उसके लिये सामान्य था पर मैने तो आज अलग खुशी मे चाय मंगवाई है. पर यहा ये राज ही रहेगा . मेरा मन तो कर रहा है खुशी खुशी मे सोने की अशर्फ़िया बंटवा दे आज तो अपनी नगरी मे . मैने फ़िर अमृत भैया को फ़ोन मिलाया जो अगले दो स्टेशन छोड़ के तीसरे पर duty रहते हैं. 
"गुड मोर्निन्ग भैया "
"मोर्निन्ग तो ठीक है पर ये बता आज आवाज अलग लग रही है.  लोहागढ फ़तेह कर लिया क्या "  मेरी आवाज मे खुशी महसूस करके वोले.
' Duty क्या है "
' जनरल '
' ठीक है आते हैं  लेमन टी पीने चलेन्गे लंच में '
' ठीक है,  पर सब ठीक तो है. '
' हा,  सब ठीक है,  बाकी मिलके बताते है.  और वो मिट्टी का किला फ़तेह करके क्या अचार डालून्गा मै , किरकिरायेगा हम दोनो के मूह मे. मिलके बताते है,  बाय! 
सबको लग तो गया कि बंदा आज खुश हैं. पर वजह सिर्फ़ मुझे ही पता है.
' सर चाय ' केदार चाय ला चुका था पता ही नही चला.
' आज कृष्णा नही आया क्या, दिख नही रहा? '
'नही सर वो उसकी वाईफ़ को होस्पिटल लेके जायेगा'  तीखी मुस्कान के साथ कहा.  क्युकी हम सबको पता है कुछ दिनो मे पिता बनने वाला है वो रूटीन चेकअप के लिये गया होगा. 

करीब  बारह बजे अचानक मुझे कुछ याद आया और सिर झझोड के एक मुक्का जोर से टेबल पे मारा.
"ओ शिट , कट गया आज तो सुबह सुबह. " मेरे मुह से निकला.  सुबह से खुश था पर अचानक से मुह उतर गया.
मैने फ़िर अमृत भैया को फोन लगाया.
"कहा हो भैया "
"स्टेशन,  क्या हुआ... आवाज मे फ़र्क है. "
"बोला तो था आके बताता हू "
"अरे पर... " मैने फोन काट दिया इतने मे. और मै तुरंत अगली लोकल से दस मिनट मे पहुच चुका था उनके पास .  दिमाग अचानक से एसे हो गया कि मुझे अब अन्दरूनी शान्ती की जरूरत थी जो मुझे इन्ही के पास आके मिलती है.
"आओ तेरा ही इंतजार था इस कुर्सी को सुबह से " अमृत भैया ने एक टूटी कुर्सी को मेरी तरफ़ खिसकाते हुये कहा. जब भी आता हूँ अक्सर यही बैठने को मिलती है. टिकट काउन्टर वाली ओफ़िस मे एक अतिरिक्त कुर्सी है वो ही काफ़ी है. 
"हा सही है,  वैसे भी इसी के लायक हू आज तो मै '"
"मैने सुना है मन मे घातक बात छुपाने से हार्ट अटैक जल्दी आते है.  तू जल्दी बता हुआ क्या है.  " उसने हसते हुये पूछा क्युकी मै उदास अक्सर एसी बातो पे ही हुआ जिन पर दूसरो को हसी आती है. फ़िर मैने पूरा माजरा बताया उन्होने एक जोर की थप्पी गुद्धी पे मारी और बोलने लगे
" क्या बात है छोरे ,  सुना तो है मैने कई बार तेरे मुह से उसके बारे और आज बात ही हो गयी.  अच्छी बात है ये तो." 
" भैया वो बोली आओ कोफ़ी पीने आज हमारे इधर और मैने हा कर दी "
"आये हाये एक दिन मे ही ? थोडा धीरे चलो बाबू "
"वो सब तो ठीक है भैया पर सोच रहा हु जाना कहा है "
"क्यू,  इसमे सोचना क्या है "
"भैया , वो नम्बर तो देके ही नही गयी यार " मैने हरी घास सामने से हटा लेने पर बकरी की तरह मिनमिनाते हुये कहा. 
" अवे  पेवर...! कटवा आया सुबह सुबह आज तो.... ! ""  और ये कहते कहते उन्होने एक दबा के घूसा चेप दिया पीठ पे जोर के ठहाके के साथ .
"समझ नही आ रहा तू भुलक्कड है या तुझमे हिम्मत नही है , जब वो भी खुश है तो तू नर्वस क्यू होता है और तू तो इतने दिन से चाहता है उसको "
" मैने कब कहा था मै उसको चाहता हूँ भैया,  ..एवई क्यू बढा रहे हो बात को एक तो उसका नम्बर नही ले पाया और उपर से आप भी "
" हा नही चाहता इसीलिये तो उसकी जूतियो के डिजाइन से ले के उसके नेल पोलिश के रंग तक याद है तुझे, "
"आप तो बात को बढा रहे हो यार "
"हा अब ठीक है इतना दुखी क्यू हो रहा है रोजगार बाला आदमी और औरत दोनो ही रोज घर से निकलते है और वो तो जब से तुझे मिली है रोज ही निकलती है शनिवार रविवार को छोड़ के. "
"मतलब " मेरे समझ नही आया .
" अरे मेरी स्ट्रीट लाइट कल फ़िर आयेगी वो ओफ़िस , तब ले लेना नम्बर. इतना बिलबिला क्यू रहा है "
" हा यार मेरा ध्यान ही नही गया" मै ये बात को भूल ही गया था बिल्कुल कि कल फ़िर आयेगी महबूबा. खूब विराम दिया इन्होने मेरी आज कि विचलित मनोदशा को . एकदम से अब मन शान्त था. और फ़िर हम दोनो बकवास करते हुये लेमन टी पीने चले गये . जो हमारा लगभग रोज का काम है. 
Cont ...

बिकते पर्चे, सिसकते ख़्वाब

​बिक जाते हैं पर्चे यहाँ, ईमान बिक जाता है, मेहनत की स्याही पर, नोटों का साया मंडराता है। अमीर की तिजोरी से यहाँ मुस्तकबिल तय होता है, ग़रीब...